स्वाध्याय
3 बातें ज्ञान की
इन तीनों के उपकारों से व्यक्ति इतना दब जाता है कि उऋण होना बड़ा मुश्किल होता है। पहले उपकारी हैं—माता-पिता। माता-पिता अपनी संतान को जन्म देते हैं, लालन-पालन करते हैं, पढ़ाते-लिखाते हैं, संस्कार देते हैं, उसकी शादी करते हैं, उसे व्यापार कराते हैं। यह कितना बड़ा उपकार है। संस्कृत साहित्य में तो यहाँ तक कहा गया है कि वह मां शत्रु है और वह पिता दुश्मन है, जो अपने बालक को पढ़ाता नहीं है, जो बालक को अच्छे संस्कार नहीं देता है।
प्रश्न होता है कि यदि हमारे जीवन में माता-पिता का इतना उपकार है तो क्या कोई उपाय है उनके उपकार से उऋण होने का? शास्त्रकार ने कहा कि तुम अपने माता-पिता की चाहे कितनी ही सांसारिक सेवा कर लो, चाहे उन्हें स्नान करा दो, चाहे उत्तम से उत्तम शतपाक या सहस्रपाक तेल से उनकी मालिश कर दो, चाहे स्वादिष्ट से स्वादिष्ट भोजन करा दो, चाहे सुगंधित चूर्ण से उनका उबटन कर दो, आभूषणों से उनके शरीर को विभूषित कर दो, चाहे श्रवण कुमार की तरह उन्हें जीवनभर कावड़ में यात्रा करा दो, इतना करने पर भी उनके उपकार से उऋण नहीं हो पाओगे। यदि तुम उनको धार्मिक बना दो, उन्हें तत्त्वज्ञान सिखा दो, उन्हें केवली प्रज्ञप्त मार्ग में स्थापित कर दो, उनके मन में देव, गुरु, धर्म के प्रति आस्था जगा दो, उनकी आत्मा का उत्थान कर कर दो तो तुम उनके उपकारों से उऋण होने की स्थिति में आ सकते हो। जैसे, किसी के माता-पिता धर्म-कर्म में अनास्था रखते हों और उनकी संतान उन्हें धर्म के मार्ग में स्थापित कर दे तो ऐसी धार्मिक सेवा से माता-पिता के उपकार से उऋण हुआ जा सकता है।
दूसरे उपकारी हैं—भर्ता। कभी कोई धनवान सेठ किसी दरिद्र का आर्थिक सहयोग कर उसका घर बसा दे, उसे कमाई करना सिखा दे, उसे अपने पैरों पर खड़ा कर दे, आत्मनिर्भर बना दे तो ऐसे सेठ के उपकार से उऋण होना बड़ा मुश्किल है। प्रश्न होता है कि ऐसा कौन-सा उपाय है जिससे ऐसे पालन-पोषण करने वाले सेठ के उपकार से उऋण हुआ जा सकता है? शास्त्रकार ने कहा कि ऐसे उपकारी सेठ की चाहे कितनी ही सांसारिक सेवा कर लो, जैसे दुर्भाग्य से किसी दिन वही उपकारी और धनवान सेठ दरिद्र बन जाए और उसी उपकृत व्यक्ति के पास सहयोग मांगने आए, तब वह उपकृत व्यक्ति यह कहे कि 'सेठ साहब! आपने मेरे ऊपर कितना उपकार किया था। मैं आपका ही दिया हुआ खा रहा हूं। आपने मुझे तैयार किया, आगे बढ़ाया, मेरा सारा धन मैं आपको देने को तैयार हूं।' यदि वह अपनी सारी संपत्ति उस सेठ को दे दे, फिर भी वह उसके उपकार से उऋण नहीं हो सकता। यदि वह व्यक्ति उस सेठ को धर्म के मार्ग पर स्थापित कर दे तो वह अपने भर्ता के उपकार से उऋण होने की स्थिति में आ सकते हैं।
तीसरे उपकारी हैं— धर्माचार्य। धर्मगुरु कितनों को दीक्षित करते हैं, शिक्षण देते हैं, समझाते हैं, मार्गदर्शन देते हैं, संयम की साधना में सहयोग देते हैं, संसार समुद्र से पार लगाने में योगदान देते हैं। इस प्रकार धर्माचार्य अनेक आध्यात्मिक उपकार करते हैं। क्या उनके उपकार से उऋण होने का कोई उपाय है? शास्त्रकार ने बताया कि कभी किसी धर्माचार्य का मन किसी कारण से अस्थिर हो जाए, धर्म के प्रति आस्था कमजोर हो जाए, कदाचित पथभ्रष्ट हो जाए, भौतिकता के रास्ते पर चला जाए, ऐसे धर्माचार्य को कोई वापस धर्म में सुस्थिर कर दे, उनकी आस्था को मजबूत बना दे तो वह धर्माचार्य के उपकार से उऋण होने की स्थिति में आ सकता है।
एक बार की बात है, आषाढ़भूति नाम के एक आचार्य हुए। उनके सामने उन्हीं के शिष्य महामारी के प्रकोप से दिवंगत होने लगे। नियति का ऐसा योग बना कि देखते-ही-देखते एक शिष्य विनोद को छोड़कर सभी शिष्य स्वर्गवासी बन गए। जब विनोद भी मरणासन्न अवस्था में आ गया, तब आचार्यप्रवर ने कहा—'वत्स! तुम देवलोक में जाकर पुनः मेरे दर्शन करना और बताना कि देवगति का स्वरूप क्या है?' शिष्य विनोद ने गुरुदेव की इस बात को स्वीकार कर लिया। कुछ ही क्षणों में वह अंतिम शिष्य भी दिवंगत हो गया। वह देवलोक में जाकर ज्योंही गुरुदर्शन के लिए आने को उद्यत हुआ, त्योंही कुछ देवांगनाओं ने उसे वहीं रोक लिया और कहा—'यहाँ का एक नाटक तो देखकर जाओ ताकि अपने गुरु के सामने स्वर्गलोक का गौरव बता सको।' जब शिष्य देवलोक से वापस नहीं आया, तब गुरु ने सोचा कि स्वर्ग-नरक कुछ नहीं है। गुरु का मन अस्थिर हो गया, श्रद्धा टूट गई, स्वर्ग-नरक के अस्तित्व से विश्वास उठ गया।
आषाढ़भूति ने सोचा कि 'मैं तो अनावश्यक ही साधु बना। अब मैं इन कष्टों को क्यों झेलूं? गृहस्थ बनकर मौज-मस्ती का जीवन जीऊंगा।' इस प्रकार धर्माचार्य होने के बावजूद मन अनास्थावान हो गया। वह घर जाने का चिंतन करने लगा। इतने में देवरूप शिष्य का सिंहासन प्रकंपित हुआ। उसने अपने ज्ञान से जाना कि मेरे गुरु श्रद्धा से च्युत हो गए हैं। वह तत्काल भूतल पर आया और एक मायाजाल रचा। उसने पृथ्वीकाय, अप्काय, तेजस्काय, वायुकाय, वनस्पतिकाय और त्रसकाय नामक छह बच्चों की विकुर्वणा की।