श्रमण महावीर

स्वाध्याय

– आचार्यश्री महाप्रज्ञ

श्रमण महावीर

क्या आज का महावीर का अनुयायी समाज समन्वयवादी है? इस प्रश्न का उत्तर सिद्धान्त में नहीं खोजा जा सकता। यह खोजा जा सकता है— चिन्तन-भेद, घृणा अथवा व्यक्तिगत या साम्प्रदायिक महत्त्वाकांक्षा के धरातल पर। सब लोगों का (और एक समाज में रहने वाले सब लोगों का भी) चिन्तन एक जैसा नहीं होता। जब तक उसका समीकरण होता रहता है तब तक वे साथ रह पाते हैं और जब अहं की प्रबलता समीकरण नहीं होने देती, तब चिन्तन-भेद स्थिति-भेद में बदल जाता है। घृणा और महत्त्वाकांक्षा भी स्थिति-भेद उत्पन्न करती हैं। इन परिस्थितियों में बौद्धिक समन्वयवाद व्यवहार को प्रभावित नहीं करता; उसे प्रभावित करता है— अहिंसक समन्वयवाद। भगवान् महावीर का समन्वय का सिद्धान्त वस्तु-जगत् में बौद्धिक है, प्राणी-जगत् में वह अहिंसक है।
कितना कठिन है विचार और व्यवहार में सामंजस्य लाने वाले अहिंसक समन्वय की दिशा का उद्घाटन!
सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय
'भिन्न-भिन्न वस्तुओं को देखते के लिए भिन्न-भिन्न आँखों की ज़रूरत नहीं है'— इस वाक्य की अभिधा से असहमति नहीं है, तो इसकी व्यंजना से पूर्ण सहमति भी नहीं है।
गुरु ने शिष्य से पूछा— 'देखता कौन है?'
शिष्य ने कहा— 'आँख।'
गुरु— 'क्या अन्धकार में आँख देख सकती है?'
शिष्य— 'प्रकाश और आँख दोनों मिलकर देखते हैं।'
गुरु— 'आँख भी है और प्रकाश भी है, पर आदमी अन्यमनस्क (कहीं और खोया हुआ) है तो क्या वह देखता है?'
शिष्य— 'मैं अपनी बात में थोड़ा संशोधन करना चाहता हूँ। मन, प्रकाश और आँख—तीनों मिलकर देखते हैं।'
गुरु— 'एक बच्चे ने आग को देखा और उसमें हाथ डाल दिया। क्या उसने आग को नहीं देखा?'
शिष्य— 'बच्चे में बुद्धि का विकास नहीं होता। वास्तव में पूर्ण दर्शन तब होता है जब बुद्धि, मन, आँख और प्रकाश—ये चारों एक साथ होते हैं।'
गुरु— 'एक बुद्धिमान आदमी को मैंने जुआ खेलते देखा है। क्या वह देखता है?'
शिष्य— 'नहीं, सही अर्थ में वही देखता है, जिसकी बुद्धि पर अस्तित्व का वरदहस्त होता है।'
व्यक्ति के दो रूप होते हैं—
व्यक्तित्व और अस्तित्व। अस्तित्व का अर्थ है 'होना' और व्यक्तित्व का अर्थ है 'कुछ होना'। हम नाम-रूप आदि को देखते हैं, तब हमें व्यक्तित्व का दर्शन होता है। हम चेतना के जागरण को देखते हैं, तब हमें व्यक्तित्व की पृष्ठभूमि में क्रियाशील अस्तित्व का दर्शन होता है।
महावीर के व्यक्तित्व का अस्तित्व पर अधिकार होता तो उनकी वाणी में मृदुता और हृदय में क्रूरता होती। उनकी वाणी और हृदय—दोनों में मृदुता का अतल प्रवाह है। इससे प्रतीत होता है कि उनका अस्तित्व व्यक्तित्व पर छाया हुआ था।
व्यक्तित्व के धरातल पर महावीर एक संघ के शास्ता, संघबद्ध धर्म के व्याख्याता और एक पंथ के प्रवर्तक हैं। अस्तित्व के धरातल पर वे केवल 'हैं'। 'होने' के सिवाय और कुछ नहीं हैं। वे न संघ के शास्ता हैं और न शासित, न धर्म के व्याख्याता हैं और न श्रोता, न द्वैतवादी हैं और न अद्वैतवादी। द्वैत और अद्वैत, व्याख्या और श्रुति, शासन और स्वीकृति—ये सब अस्तित्व की शाखाएँ हैं। महावीर की सम्पूर्ण यात्रा व्यक्तित्व से अस्तित्व की ओर है। महावीर ने कहा है–
'जिसे तू मारना चाहता है, वह तू ही है।'
'जिस पर तू शासन करना चाहता है, वह तू ही है।'
'जिसे तू परितप्त करना चाहता है, वह तू ही है।'
'जिसे तू दास बनाना चाहता है, वह तू ही है।'
'जिसे तू उपद्रुत करना चाहता है, वह तू ही है।'