संबोधि

स्वाध्याय

– आचार्यश्री महाप्रज्ञ

संबोधि

विमला ठक्कर ने मौन में तथ्य के साक्षात्कार की बात कही है। 'मौन चित्त की निष्कंपन की अवस्था है, जिसमें विचार और भावना की तरंग नहीं है। विचार, भावना, अहंकार में सारी की सारी ऊर्जा जो बिखर गई थी वह सिमट कर अपने आप में इकटठी हो जाती है। वह फिर देखती है। उसका देखना द्रष्टा और दृश्य—दोनों को मिटा देता है। तथ्य का साक्षात्कार होना तथ्याकार हो जाना है।'
बौद्ध ध्यान परम्परा के महान् आचार्य बोधिधर्म ने सत्य में प्रवेश के दो द्वारों का प्रयोग प्रस्तुत किया है—ज्ञान और कर्म।
ज्ञान—
मेरा यह दृढ़ विश्वास है कि सब प्राणियों में एक ही सत्य निहित है। वे सदैव बाह्य विषयों से अवरुद्ध रहते हैं, इसलिए मैं उनसे असत्य को त्यागकर सत्य के ग्रहण करने का आग्रह करता हूं। दीवार को देखते हुए उन्हें अपने चित्त की वृत्तियों को यह मनन करते हुए एकाग्र करना चाहिए कि अहं (मैं) और अपर (दूसरे) का अस्तित्व ही नहीं है तथा ज्ञानी और अज्ञानी एक समान हैं।
कर्म—
साधक को सब कठिनाइयों को यह समझ कर सहना चाहिए कि मैं अपने पूर्व जन्म के कुकर्म का फल भोग रहा हूं। उसे अपने भाग्य से संतुष्ट रहना चाहिए, चाहे सुख हो या दुःख, लाभ हो या हानि। उसको किसी वस्तु की तृष्णा नहीं करनी चाहिए। उसको धर्म (सत्य) का अनुसरण करना चाहिए।
इसी परम्परा के एक अन्य ध्यानी साधक ने अपने शिष्य को निम्नोक्त विधि के अनुसरण का निर्देश दिया है— 'शास्त्र के प्रवचन और अध्ययन को कुछ समय के लिए छोड़ो। कुछ दिन के लिए अपने कमरे में बन्द हो जाओ। गर्दन सीधी कर शांत होकर बैठो और अपने विचारों को एकाग्र करो। अच्छे-बुरे के द्वन्द्वात्मक तर्क को छोड़कर आंतरिक संसार को देखो। ज्ञान उसके लिए 'प्रत्यात्मवेद्य' होना चाहिए।'
ध्यान और समत्व
ध्येय मंजिल है और ध्यान उसका मार्ग है। साधक का ध्येय होता है—शुद्ध आत्मा का अनुभव। आत्मा को आवृत करने वाले हैं—राग और द्वेष। चित्त प्रतिक्षन इसके द्वारा प्रकंपित रहता है। चेतना प्रकंपनों के कारण परिलक्षित नहीं होती। ध्यान के साथ जो प्रतिक्रिया-मुक्ति की बात जुड़ी है या कही जाती है वह इसलिए कि प्रतिक्रिया प्रकंपन है और प्रकंपन से हम ध्येय के सन्निकट नहीं पहुंच सकते। आगम की परिभाषा में प्रतिक्रिया-मुक्ति के लिए शब्द है—समता। साधक समस्त अनुकूल और प्रतिकूल द्वंद्वों में सतत समतावान् रहे, तटस्थ रहे। 'समयाए समणो होइ' श्रमण समता से होता है।
'जो समो सव्वभूएसु, तसेसु थावरेसु य।
तस्स सामाइयं होइ, इति केवलिभासियं।।'
'आत्मद्रष्टा पुरुषों ने कहा है कि सामायिक उसी साधक के होती है जो त्रस, स्थावर, स्थूल और सूक्ष्म चराचर जगत् के प्रति सम रहता है।'
समता के अभाव में ध्यान-साधना अपना कोई प्रतिफल नहीं ला सकती। साधक को प्रारंभ में ही इस सत्य का बोध हो जाना चाहिए कि मेरी प्रत्येक क्रिया में समत्व प्रतिष्ठित रहे। बाहर से होने वाले आघातों के प्रति सतत जागरूक रहना और अपने मन को किंचिदपि आंदोलित नहीं करना, ध्याता के लिए यह नितांत अपेक्षित है। इसलिए ध्यान में प्रतिष्ठित साधकों ने समता और ध्यान को भिन्न नहीं माना। ये दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं। आचार्य हेमचंद्र ने कहा है—
'समत्वमवलम्ब्याय, ध्यानं योगी समाश्रयेत्।
विना समत्वमारब्धे, ध्याने स्वात्मा विडम्ब्यते ।।'
'योगी समता का आलंबन लेकर ध्यान के पथ पर अग्रसर बने। समत्व के शुभारंभ के अभाव में वह ध्यान में बैठकर अपने-आपको विडंबित करता है।'