'तेरापंथ-मेरापंथ' कार्यशाला का आयोजन

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टोहाना।

'तेरापंथ-मेरापंथ' कार्यशाला का आयोजन

जैन श्वेताम्बर तेरापंथी महासभा के निर्देशानुसार परम आराध्य आचार्य भिक्षु को ज्ञानात्मक श्रद्धांजलि अर्पित करने के उद्देश्य से श्री जैन श्वेताम्बर तेरापंथी सभा के तत्वावधान में 'तेरापंथ मेरा पंथ' कार्यशाला का आयोजन किया गया। कार्यशाला में प्रशिक्षिका के रूप में पंचकूला से समागत उपासिका बहन सुश्री सुरजीत सिंगला ने आचार्य भिक्षु के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर विस्तृत प्रकाश डालते हुए श्रावक समाज को उनके जीवन, सिद्धांतों तथा धर्म क्रांति से जुड़े अनेक ज्ञानवर्धक प्रसंगों एवं दृष्टांतों से अवगत कराया। उन्होंने कहा कि कोई भी महान कार्य केवल उपादान से नहीं, बल्कि नियति एवं योग्य निमित्त के संयोग से पूर्ण होता है। सत्य क्रांति के लिए आचार्य भिक्षु में जो अदम्य साहस था, उसी का परिणाम है कि तेरापंथ धर्मसंघ का सूर्य उदित हुआ। अस्तित्व उसी का बना रहता है, जो तूफानों एवं विपरीत परिस्थितियों में भी झुकने के बजाय सीना तानकर उनका सामना करता है। उन्होंने कहा कि आचार्य भिक्षु ने सत्य क्रांति एवं मर्यादा पालन के लिए अनेक कष्ट सहे, जिन्हें सुनकर आज भी रोंगटे खड़े हो जाते हैं। तेरापंथ धर्मसंघ के विकास में मुनि थिरपालजी एवं फतेहचंदजी निमित्त बने तथा आचार, विचार, ज्ञान, दर्शन, चरित्र और तप की क्रांति को आगे बढ़ाने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही। उपासिका बहन सुश्री सुरजीत सिंगला ने कहा कि आचार्य भिक्षु ने अनासक्त भाव से जीवन जिया। उन्हें न अपने प्राणों का मोह था और न ही अपने शिष्यों के प्रति आसक्ति। उनका वास्तविक अनुराग केवल सत्य और अहिंसा के मार्ग से था। उन्होंने बताया कि आचार्य भिक्षु का उद्देश्य कोई नया धार्मिक संप्रदाय स्थापित करना नहीं था, बल्कि प्रकृति की विलक्षण व्यवस्था के अनुसार सहज रूप से तेरापंथ धर्मसंघ का निर्माण हुआ। इस धर्म क्रांति के मूल में आचार शिथिलता से लेकर गृह-प्रभाव तक अनेक दृश्य एवं अदृश्य कारणों का योगदान रहा, किंतु इसकी सफलता तभी संभव हुई, जब सत्यनिष्ठ, धर्मपरायण एवं महत्तम व्यक्तित्व के धनी आचार्य भिक्षु जैसा नेतृत्व प्राप्त हुआ।