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तेरापंथ-मेरापंथ कार्यशाला का आयोजन
आचार्य श्री भिक्षु के जन्म त्रिशताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में श्री जैन श्वेताम्बर तेरापंथी महासभा द्वारा निर्देशित 'तेरापंथ मेरा पंथ' कार्यशाला का सफल आयोजन श्री जैन श्वेताम्बर तेरापंथी सभा, नागपुर द्वारा अणुव्रत भवन में किया गया। कार्यशाला प्रशिक्षक उपासक रतन सिंयाल मुंबई से पधारे। सभा अध्यक्ष संजय पुगलिया ने स्वागत वक्तव्य प्रस्तुत करते हुए सभी उपस्थित श्रावक - श्रविकाओं का हार्दिक अभिनन्दन किया कार्यशाला की उपयोगिता एंव उद्देश्य पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि आचार्य भिक्षु जन्म त्रिशताब्दी वर्ष के अवसर पर आयोजित यह कार्यशाला तेरापंथ के सिद्धांतों एवं आदर्शों को गहराई से समझने का एक महत्वपूर्ण माध्यम है।
उपासक रतन सिंयाल का प्रेरणादायी मार्गदर्शन प्राप्त हुआ। हम तेरापंथी है, लेकिन तेरापंथी है, तो आपका मकसद क्या है? आपका लक्ष्य क्या है? क्या आप ये चाहते हो की मैं हिंसा करता जाऊं और उसमें मैं धर्म मानता जाऊं? मैं अधर्म की क्रिया करता जाऊं और उसी में मैं धर्म भी मान लूँ नहीं हो सकता। हिंसा हिंसा ही है और अहिंसा अहिंसा ही है। चाहे आपने आवश्यक काम के लिए भी हिंसा की है तो भी वह हिंसा ही गिनी जाएगी। उन्होंने जैन तत्व दर्शन तथा दान-दया के दो पक्ष लौकिक और लोकोत्तर के बारे में विस्तृत प्रकाश डाला। शुद्ध साध्य की प्राप्ति के लिए शुद्ध साधन की आवश्यकता व प्रतिमा पूजा के संबंध में तेरापंथ के दृष्टिकोण को भी विस्तार से प्रस्तुत किया। तत्पश्चात नागपुर उपासक आदित्य कोठारी ने अत्यंत सरल, तार्किक एवं प्रभावी शैली में जैन धर्म के मूल तत्वों, तेरापंथ धर्मसंघ की विशिष्टताओं,एंव आचार्य भिक्षु द्वारा प्रतिपादित लौकिक एवं लोकोत्तर धर्म के सिद्धांतों का विस्तृत विवेचन किया।