गुरुवाणी/ केन्द्र
कोई अपमान का ज़हर भी घोले... तो आप शांति का घूंट पी जाइए! :आचार्यश्री महाश्रमण
जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के ग्यारहवें अधिशास्ता, अहिंसा यात्रा प्रणेता, महातपस्वी आचार्यश्री महाश्रमणजी ने निर्धारित विषय ‘न रूष्ट हों न तुष्ट’ पर चतुर्विध धर्मसंघ को उत्तरज्झयणाणि आगम के माध्यम से अमृत पाथेय प्रदान किया। पूज्य प्रवर ने फरमाया कि अनुकूल और प्रतिकूल—दोनों ही परिस्थितियों में मन को समभाव में रखना ही सच्चे साधक का धर्म है।
इतिहास का महान समागम : मुनि केशी और स्वामी गौतम संवाद–
१. संशयों का निवारण : निर्ग्रन्थ प्रवचन परंपरा के दो दैदीप्यमान नक्षत्र—घोर पराक्रमी कुमार श्रमण केशी और श्रुतधर ज्ञानी स्वामी गौतम के बीच आध्यात्मिक ज्ञान चर्चा हुई। गौतम स्वामी से समाधान पाकर मुनि केशी के समस्त संशय छिन्न-भिन्न हो गए।
२. दो परंपराओं का विलय : इस ऐतिहासिक संवाद के पश्चात् मुनि केशी ने भगवान पार्श्वनाथ की चातुर्याम परंपरा से भगवान महावीर की पंच महाव्रतात्मक परंपरा को सहर्ष स्वीकार किया। आचार्यश्री ने इसे 'पूर्व से पश्चिम का महामिलन' बताते हुए कहा कि इससे श्रुत और शील का महान उत्कर्ष हुआ।
३. पराक्रम और पुरुषार्थ की प्रेरणा : आचार्यश्री ने परंपरागत महापुरुषों और परम पूज्य आचार्य श्री तुलसी के प्रलम्बतम विहारों का स्मरण कराते हुए चारित्रात्माओं को ज्ञान, स्वाध्याय और प्रवचन के क्षेत्र में घोर पुरुषार्थ करने की प्रेरणा दी।
जीवन दर्शन : न रुष्ट हों, न तुष्ट–
जीवन में समता धारण करने के लिए आचार्यश्री ने कड़क व्यावहारिक मार्गदर्शन प्रदान किया।
१. समभाव का सूत्र: गोचरी या जीवन के व्यवहार में अनुकूल स्थिति आए तो अति-प्रसन्न (तुष्ट) न हों और प्रतिकूल स्थिति या इंकार मिलने पर गुस्सा (रुष्ट) न करें।
२. निंदा-प्रशंसा से परे : देने वाले की अति-प्रशंसा करना और न देने वाले की निंदा करना—दोनों से बचना चाहिए।
३.स्वाभिमान और दीनताहीनता: साधु या साधक को किसी वस्तु या भोजन के लिए दीनता नहीं दिखानी चाहिए और न ही संबंधों का हवाला देना चाहिए। स्वाभिमान के साथ सहज समता बनाए रखनी चाहिए।