प्रखर प्रतिभा व अन्तरप्रज्ञा के विलक्षण थे- आचार्य महाप्रज्ञ

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बीदासर।

प्रखर प्रतिभा व अन्तरप्रज्ञा के विलक्षण थे- आचार्य महाप्रज्ञ

युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी की सुशिष्या समाधि केन्द्र व्यवस्थापिका साध्वी मंजुयशा जी के पावन सान्निध्य में आचार्य श्री महाप्रज्ञजी की 107 वीं जन्मजयन्ती 'प्रज्ञा दिवस'' कि रूप में बड़े उत्साह पूर्वक मनाया। तेयुप के अध्यक्ष चिराग बैंगानी नि अपने विचारों की अभिव्यक्ति देते हुए अपनी टीम के साथ सुमधुर गीत की प्रस्तुति दी। साध्वी श्री जी ने अपने मंगल उद्‌बोधन में कहा- येक्षव शासन एक गौरवशाली शासन है। इसकी यशस्वी आचार्य परम्परा में दसवे आचार्य श्री महाप्रज्ञ जी हुए। उनका जीवने विलक्षण विशेषताओं का अद्‌द्भुत संगम था। अप्पने अपनी पवित्र प्रज्ञा द्वारा अनेक प्रगति के द्वार उद्‌घाटित किए। एक छोटे से गांव टमकोर में तोलारामजी के प्रांगण में माता बालुजी की कुक्षी से खुले आकाश में एक भव्यात्माका अवतरण अवतरण हुआ हुआ । १० वर्षकी वर्ष अल्पायु में पूज्य कालुगणी के चरणों में दीक्षित हो समर्पित होगारी और भाग्य से मुनि तुलमी से शिक्षा प्राप्त कर एक साधारण से असाधारण तक पहुंच गए। विनय समर्पण, अनुशासनबद्धता, प्रबल पुरुषार्थ, गुरु के इंगित यकार के अनुसार चलते हुए नत्यु से मुनि नथमल, नथमल से महायज्ञ एवं महाप्रज्ञ से युवाचार्य महाप्रज्ञ एवं आचार्य महाप्रज्ञ बन गए। अनेक विषयों का तथा अनेक दर्शनों दार्शनिक बने। कोई विषय ‌आपसे अधुता नहीं रहा। आपने बषों तक ध्यान की साधना महायोगी बने। आगम संपादन का दुरुह कार्य हाथ में लेकर अपनी लेखने से कुशल संपादन किया। अनेक ग्रंथों की रचना कर आप एक्‌कुशल साहित्यकार बने।