3 बातें ज्ञान की

स्वाध्याय

– आचार्यश्री महाश्रमण

3 बातें ज्ञान की

वे सभी आभूषणों से सुसज्जित थे। जिस प्रकार बिल्ली की आंखें मूषक पर और मोर की आंखें सांप पर टिकी रहती हैं, उसी प्रकार आचार्य आषाढ़भूति का ध्यान उन बच्चों के आभूषणों पर टिका हुआ था। लोभांध बनकर निर्दयता से प्रत्येक बच्चे की हत्या कर दी और बड़ा-सा गर्त खोदकर छहों शवों को गाड़ दिया। फिर उन सभी आभूषणों को पात्र में डालकर आगे बढ़ने लगा। जब उन बच्चों के पारिवारिकजनों को असलियत पता चली, तब आचार्य आषाढ़भूति को सब धिक्कारने लगे। आचार्य आषाढ़भूति अनुताप कर रहे थे, उसी समय वह देव शिष्य विनोद के रूप में प्रकट हुआ। आचार्यवर ने कहा—'शिष्य विनोद! तुम इतने दिन कहां थे? मैंने तुम्हें कितनी बार याद किया, किन्तु तुम तो आए ही नहीं। मैं तो संयम मार्ग से भटक गया। भौतिक सुख-विलासी और धन का अभिलाषी बन गया। यदि कुछ देर पहले आ जाते तो मैं ज्ञान, दर्शन, चारित्र से भ्रष्ट नहीं होता।' तब देवरूप शिष्य ने कहा—'यह सारा मायाजाल मैंने ही रचा था। मैं दर्शन करने आ गया हूं। स्वर्ग-नरक आदि सब यथार्थ हैं। आप धर्म में दृढ़ श्रद्धा वाले बनें और अपनी लक्षित मंजिल को प्राप्त करें।' गुरु का मन पुनः संयम में स्थिर होने लगा। शिष्य ने बहुत बड़ा योगदान दिया और अपने गुरु को गिरने से बचा लिया। फिर आचार्य आषाढ़भूति ने साधना की और अपने कर्मों को क्षय कर मोक्ष को प्राप्त कर लिया।
इस प्रकार शिष्य ने गुरु की आध्यात्मिक सेवा की। संयम में अस्थिर हुए, पथभ्रष्ट बने धर्मगुरु के मन को पुनः संयम में स्थिर कर दिया। यदि ऐसा काम कोई शिष्य कर दे तो वह अपने गुरु के उपकार से उऋण हो सकता है। परम पूज्य गुरुदेव तुलसी ने अपने ग्रंथ 'पानी में मीन पियासी' में लिखा है—
ऋणमुक्त सुगुरु की उपकृति से होने का एक मात्र साधन,
जब नियति योग से आत्म धर्म से हो जाए विचलित गुरु-मन।
देकर प्रतिबोध पुनः पावन संयम के सत्पथ पर लाए,
संस्थापित कर धार्मिकता में गुरु ऋण से शिष्य मुक्ति पाए।।
उपकार एक ऐसा तत्त्व है जो आदमी को परस्पर जोड़ने वाला होता है और उसे पार लगाने वाला भी हो सकता है। उपरोक्त तीनों पदों में से माता-पिता और भर्ता मुख्यतया सांसारिक संदर्भ में उपकारी होते हैं और धर्माचार्य नितांत आध्यात्मिक उपकारी होते हैं। इनके माध्यम से शास्त्रकार ने एक मार्गदर्शन दिया है कि किसी भी उपकारी के उपकार से उऋण होना बड़ा मुश्किल काम है, परन्तु कोई अपने उपकारी की धार्मिक सेवा कर उसे धर्म में स्थापित कर दे तो उसके उपकार से उऋण हुआ जा सकता है।
तीन प्रकार का सुप्रणिधान
ठाणं में बताया गया है— तिविहे सुप्पणिहाणे पण्णत्ते, तं जहा—मणसुप्पणिहाणे, वयसुप्पणिहाणे, कायसुप्पणिहाणे। (3/97)
सुप्रणिधान तीन प्रकार का होता है—
1. मनसुप्रणिधान
2. वचनसुप्रणिधान
3. कायसुप्रणिधान
प्रणिधान का अर्थ है एकाग्रता— एक चीज पर केन्द्रित हो जाना। दो शब्द आते हैं—एकाग्र होना और व्यग्र होना। एक बिंदु पर केन्द्रित होना, एक आलंबन पर केन्द्रित होना एकाग्र होना कहा जाता है और विविध केन्द्रों पर चले जाना, कभी यहाँ कभी वहाँ चलायमान रहने को व्यग्र होना कहा जाता है। एकाग्रता के दो प्रकार हैं—शुभ और अशुभ। शुभ एकाग्रता तीन प्रकार की होती है—मन की शुभ एकाग्रता, वचन की शुभ एकाग्रता और काया की शुभ एकाग्रता। एकाग्रता तो एक बगुले की भी हो सकती है; वह मछली के प्रति कितना एकाग्र रहता है। रात को कई बार देखते हैं कि लाइट (light) के प्रकाश में दीवारों पर छिपकली आती है और छोटे-छोटे जीव-जंतुओं, मच्छरों के लिए एकाग्र हो जाती है। संभवतः बगुले और छिपकली की एकाग्रता हिंसा के प्रति या खाने के प्रति होती है। उस एकाग्रता को शुभ एकाग्रता नहीं कहा जा सकता। जप एक ऐसा माध्यम है जिससे मन, वचन और काया तीनों की शुभ एकाग्रता एक साथ हो सकती है।
नमस्कार महामंत्र बहुत ही पवित्र और आध्यात्मिक लाभ देने वाला मंत्र है। नमस्कार महामंत्र का पहला पद है—*णमो अरहंताणं*। हमारी पूरी दुनिया में, पूरे ब्रह्माण्ड में, पूरे मनुष्य लोक में अर्हतों से बड़ा कोई आदमी नहीं है। उन अर्हतों को नमन।w