श्रमण महावीर

स्वाध्याय

– आचार्यश्री महाप्रज्ञ

श्रमण महावीर

इस पद-पद्धति को पढ़कर अद्वैतवादी कहेगा— 'महावीर अद्वैतवादी थे।' जैन दर्शन का विद्यार्थी उलझ जाएगा कि 'महावीर द्वैतवादी थे, फिर उन्होंने अद्वैत की भाषा का प्रयोग कैसे किया?' महावीर इन दोनों से ही दूर हैं, वे अस्तित्ववादी हैं। अद्वैत और द्वैत—दोनों अस्तित्व से निकलते हैं, इसलिए अस्तित्ववादी कभी अद्वैत की भाषा में बोल जाता है और कभी द्वैत की भाषा में। 'होने' की अनुभूति में जो एकात्मकता है, वह 'कुछ होने' की अनुभूति में नहीं हो सकती। 'कुछ होने' का अर्थ भेदानुभूति है। उसमें हिंसा का संस्कार क्षीण नहीं होता। अपनी हिंसा कोई नहीं चाहता। यदि कोई आत्मा मुझसे भिन्न नहीं है, तो मैं किसे मारूँगा? अस्तित्व के धरातल पर यह अभेदानुभूति है; यही है अहिंसा। आत्मा ही हिंसा है और आत्मा ही अहिंसा है। आत्मा-आत्मा के बीच जो भेदानुभूति है, वह हिंसा है और आत्मा-आत्मा के बीच जो अभेदानुभूति है, वह अहिंसा है। जहाँ केवल 'होना' है, वहाँ भेद और अभेद की भाषा नहीं है। यह भाषा उस जगत् की है, जहाँ 'कुछ होना' ही सत्य है। व्यक्तित्व के जगत् में महावीर का तर्क दूसरा है। वे कहते हैं— 'किसी प्राणी को मत मारो।'
महावीर का युग यज्ञ का युग था। उस युग के ब्राह्मण यज्ञ की हिंसा का मुक्त समर्थन करते थे। उनका सिद्धान्त था कि धर्म के लिए किया जाने वाला प्राणी का हनन निर्दोष है। इस प्रकार की हिंसा का उन्मूलन करने के लिए भगवान् ने आत्म-तुला की भाषा का प्रयोग किया। भगवान् ने उनसे कहा— 'मैं आप सबसे पूछना चाहता हूँ कि आपको सुख अप्रिय है या दुःख अप्रिय है?'
उन्होंने नहीं कहा कि सुख अप्रिय है। यह प्रत्यक्ष विरुद्ध बात वे कैसे कहते? उन्होंने कहा— 'हमें दुःख अप्रिय है।' तब भगवान् ने कहा— 'जैसे आपको दुःख अप्रिय है, वैसे ही दूसरे प्राणियों को दुःख अप्रिय है। प्राण का हरण दुनिया में सबसे बड़ा भय है। फिर आप लोग हिंसा को अहिंसा का जामा कैसे पहनाते हैं? धर्म के नाम पर हिंसा का समर्थन कैसे करते हैं?'
इस अद्वैत की भाषा में मारने वाला व्यक्ति मारे जाने वाले व्यक्ति से भिन्न है। व्यक्तित्व की भिन्नता होने पर भी दोनों में एक धर्म समान है—वह है दुःख की अप्रियता। इस समान धर्म की अनुभूति होने पर हिंसा की वृत्ति शांत हो जाती है।
पुराने जमाने में पंचायत समाज की प्रभावी संस्था थी। पंच का फैसला न्यायाधीश के फैसले की भांति मान्य होता था। एक व्यक्ति पर अपने पड़ोसी की भैंस चुराने का आरोप आया। मामला पंचों तक गया। पंच न्याय करने बैठे। अभियुक्त को सामने बैठा दिया। वह अभियोग स्वीकार नहीं कर रहा था। पंचों ने न्याय करने का निर्णय लिया। उन्होंने एक तवा गर्म करवाया। वह अग्निमय हो गया। पंचों ने निर्णय सुनाया कि यह गर्म तवा इसके हाथ पर रखा जाएगा। इसका हाथ नहीं जलेगा तो यह चोरी के आरोप से मुक्त समझा जाएगा और यदि इसका हाथ जल गया तो इस पर चोरी का आरोप सिद्ध हो जाएगा। अभियुक्त ने इस निर्णय को स्वीकार कर लिया।
एक पंच उठा। संडासी से तवा पकड़ अभियुक्त के हाथ पर रखने लगा। उसने हाथ खींच लिया। पंच ने उसे डांटा। वह बोला, 'डांटने की कोई आवश्यकता नहीं है। पंच का हाथ तो मेरा हाथ है। पंच की संडासी तो मेरी संडासी है। पंच महोदय! आप तो चोर नहीं हैं? आप इस तवे को हाथ से उठाकर दीजिए, मेरा हाथ इसे झेलने को तैयार नहीं है।'
इस समानता के सूत्र ने निर्णय का मार्ग बदल दिया। पंच चुपचाप अपने आसन पर बैठ गया।
भगवान् महावीर ने इस समानता के सूत्र द्वारा हजारों-हजारों व्यक्तियों को जागृत किया।
भगवान् बुद्ध ने 'बहुजनहिताय' का उद्घोष किया। भगवान् महावीर ने 'सर्वजीवहिताय' की उद्घोषणा की।
गौतम ने पूछा— 'भंते! शाश्वत धर्म क्या है?'
भगवान् ने कहा— 'अहिंसा।'
'भंते! अहिंसा किनकी रक्षा के लिए है?'
'सब जीवों की रक्षा के लिए है।'
'भंते! थोड़े जीवों की हिंसा द्वारा बहुतों की रक्षा संभव है। पर सबकी रक्षा कैसे सम्भव है?'
'अहिंसा के घड़े में शत्रुता का एक भी छेद नहीं रह सकता। वह पूर्ण निश्छिद्र होकर ही समत्व के जल को धारण कर सकता है।'