संबोधि

स्वाध्याय

– आचार्यश्री महाप्रज्ञ

संबोधि

'न साम्येन विना ध्यानं, न ध्यानेन विना च तत्।
निष्कम्पं जायते तस्माद्, द्वयमन्योन्यकारणम्॥'
'समता के बिना ध्यान नहीं है और ध्यान के अभाव में समता नहीं है। दोनों स्थिरता का संपादन करते हैं, इसलिए वे एक-दूसरे से संयुक्त हैं।'
महावीर ने कहा है— 'समया धम्ममुदाहरे मुणी' अर्थात् धर्म समता में है। आचार्य शुभचन्द्र कहते हैं—
'साम्यमेव परं ध्यानं, प्रणीतं विश्वदर्शिभिः।
तस्यैव व्यक्तये नूनं, मन्येऽयं शास्त्रविस्तरः।।'
समता ही परम ध्यान है, तत्त्वद्रष्टाओं ने ऐसा प्रणयन किया है। समस्त शास्त्रों का यह विस्तार उसी समता की अभिव्यक्ति के लिए है, ऐसा मेरा विश्वास है। आगे कहते हैं— 'सूक्ष्म, स्थूल, चेतन और अचेतन पदार्थों पर क्षण-क्षण में राग या द्वेष करने वाला व्यक्ति आध्यात्मिक कैसे हो सकता है?
आत्मा को समता से इस प्रकार भावित कर कि राग-द्वेष से वह किसी भी पदार्थ को ग्रहण न करे।'
बुद्ध के साथ आनंद थे। मार्ग में प्यास लगी। बुद्ध ने कहा, 'पानी लाओ। नदी दूर थी। आनंद पानी लाने गए। अभी-अभी गाड़ियों के निकलने से पानी गंदला हो गया था, पीने जैसा नहीं था। वापस लौटे और कहा, 'पानी गंदा है। बुद्ध ने कहा, 'अब फिर जाओ, गंदा हो तो थोड़ी देर रुक जाना।' आनंद गया। थोड़ी देर रुका। देखा, पानी बिल्कुल स्वच्छ है। गाड़ियों के निकलने से गंदगी ऊपर आई थी। पानी लेकर लौटा और कहा, 'आज आपने एक सूत्र दे दिया। मेरे चित्त की भी यही स्थिति है। विचारों की गाड़ियां निकलती रहती हैं। विचारों को शांत करने से सत्य उपलब्ध हो जाता है।
ध्यानसाधक ध्यान और समता के पारस्परिक गहन संबंध को विस्मृत न करे। ध्येय की पूर्ति में दोनों अभिन्न सहयोगी हैं।
ध्यान योग्य आसन
ध्यान की अपरिपक्व स्थिति में आसन और मुद्राओं का भी अपना महत्त्व है। वे चित्त की एकाग्रता का संपादन करने में सहयोगी हैं। इसलिए *इन्हें* सभी ने अपनाया है। ध्यान सिद्धि के अनन्तर इनका कोई उपयोग नहीं रहता। फिर चाहे जैसी स्थिति में बैठे, सोये, खड़े रहे या चले।
आसनों में ध्यान योग्य आसन पद्मासन, सिद्धासन, वज्रासन आदि सामान्यतया प्रचलित रहे हैं। मुद्राओं में बायीं हथेली पर *दाहिनी* हथेली को गोद में रखना, तथा ज्ञानमुद्रा अंगूठे और तर्जनी अंगुली के सिरों का स्पर्श, बाकी तीन अंगुलियां खुली, हाथ घुटनों पर रखना।
आसन और मुद्रा का ध्येय यह रहा है कि साधना काल में जो ऊर्जा का प्रवाह प्रवाहित
होता है, वह बाहर प्रवाहित न हो। वह शरीर की विशेष स्थिति बन जाने के कारण भीतर-ही-भीतर या विशेष आकृति में निर्मित होकर साधक को शक्ति प्रदान करती रहे, व्यर्थ न जाए। चित्त की चंचलता को भी मुद्राएं नियमित करती हैं। शान्त और अशान्त स्थिति में हाव-भाव बदल जाते हैं। यह यत्किंचित् सबका अनुभव है। हम अपनी शान्त स्थिति के लिए उस आकृति को अपनाएं जिससे कि चित्त सहज तथा शीघ्र स्थिर हो जाए। चित्त को बदलने के लिए आकृति का बदलना जरूरी है।
आज वैज्ञानिक भी इस बात से राजी हैं कि मन की भावना का शरीर के साथ बड़ा संबंध है। जेम्स और *लैंगे, अमेरिका के दो विचारकों ने इस पर गहरा काम किया है। उनका सिद्धांत 'जेम्स-लैंगे*' के नाम से प्रसिद्ध है। भयभीत आदमी भागता है, यह हम सबका अनुभव है। किन्तु वे कहते हैं—भाग रहा है, इसलिए डर रहा है। अगर ठहर जाए तो भय भी न रहे। शरीर और मन जुड़े हैं। दोनों में से एक भी स्थिर और शांत हो तो स्थिति में परिवर्तन निश्चित आ जाता है। आसनों का यथोचित उपयोग कर ध्येय की साधना ही साधक का कर्त्तव्य है।