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तेरापंथ के राम : भिक्षु स्वाम
भूमिका
आचार्य भिक्षु त्रिशताब्दी के अवसर पर भिक्षु को पढ़ने, सुनने और समझने का अच्छा अवसर मिला| आचार्य श्री महाश्रमण जी ने एक बार अपने प्रवचन में फरमाया। उत्तराध्यान के पन्द्रहवें अध्ययन और आचार्य भिक्षु के जीवन की समानताओं का प्रस्तुतिकरण हो सकता है उनकी प्रेरणा से मैंने एक छोटा सा प्रयास किया है|
जैन आगमों में उत्तराध्ययन सूत्र केवल एक धार्मिक ग्रन्थ नहीं, बल्कि साधक के जीवन का आदर्श पथप्रदर्शक है। इसमें एक परिपक्व भिक्षु के गुणों, आचरण, मानसिक परिष्कार और आध्यात्मिक ऊँचाइयों का अत्यंत सूक्ष्म वर्णन मिलता है। इन लक्षणों को पढ़ते समय सहज ही प्रश्न उठता है कि क्या इतिहास में कोई ऐसा महापुरुष हुआ है जिसके जीवन में ये सभी गुण प्रत्यक्ष रूप से दिखाई देते हों?
आचार्य भिक्षु का जीवन इसी प्रश्न का सजीव उत्तर है। उन्होंने जिन सिद्धान्तों का प्रतिपादन किया, उन्हें पहले स्वयं अपने जीवन में जिया। उनके जीवन की अनेक घटनाएँ उत्तराध्ययन सूत्र में वर्णित परिपक्व भिक्षु के लक्षणों का मूर्त उदाहरण बनकर सामने आती हैं। यह केवल आचार्य भिक्षु की प्रशंसा करना नहीं, बल्कि यह दिखाना है कि उत्तराध्ययन सूत्र में वर्णित आदर्श किसी कल्पना का विषय नहीं हैं; वे आचार्य भिक्षु के जीवन में पूर्णतः चरितार्थ हुए हैं।
१. 'मोणं चरिस्सामि समिच्च धम्मं' — सम्यक् धर्म को स्वीकार कर उसका आचरण करना
आचार्य भिक्षु का प्रारम्भिक धार्मिक जीवन गच्छवासी परम्परा में प्रारम्भ हुआ। उन्होंने अनेक मतों और विचारधाराओं का अध्ययन किया, केवल परम्परा का अनुसरण नहीं किया। गहन विवेक और अध्ययन के बाद जिनधर्म को स्वीकार किया। गृहस्थ रहते हुए भी पत्नी के साथ ब्रह्मचर्य का पालन प्रारम्भ कर दिया और विक्रम संवत् १८०८ मार्गशीर्ष कृष्णा द्वादशी को मुनिदीक्षा ग्रहण कर जीवनपर्यन्त उस धर्म का अक्षुण्ण पालन किया। उनके लिए धर्म केवल स्वीकार करने की वस्तु नहीं था, बल्कि जीवन का आचरण था।
१. उज्जुकडे — ऋजुता और सरलता
आचार्य भिक्षु का जीवन ऋजुता से परिपूर्ण था । कुछ लोगों ने उनसे कहा भिखण जी! आपके वैराग्य,चरित्र निष्ठा और महान विद्वता से हम बहुत प्रभावित हैं आप वस्त्र रखना छोड़ दे तो हम सब आपके शिष्य बन जाए |आचार्य भिक्षु ने ऋजुता से कहा- श्रावकों! मैंने श्वेतांबर शास्त्रों के आधार पर दीक्षा ली है वंहा वस्त्र रखने में दोष नहीं ,जिस दिन दिगंबर के शास्त्रों में श्रद्धा होगी तो कपडे छोड़ने में संकोच नहीं |यह थी आचार्य भिक्षु की ऋजुता|
यह उत्तर बताता है कि उनके निर्णय लोकप्रियता पर नहीं, बल्कि आगम पर आधारित थे।
२. अकामकामे— विषय-वासना से मुक्त
गृहस्थ जीवन में रहते हुए ही आचार्य भिक्षु ने ब्रह्मचर्य का अभ्यास प्रारम्भ कर दिया था। पत्नी के देहावसान के पश्चात् दूसरी शादी का प्रस्ताव आया, किन्तु उन्होंने उसे स्पष्ट रूप से अस्वीकार कर आजीवन ब्रह्मचर्य का व्रत धारण कर लिया। यह केवल बाहरी त्याग नहीं था, बल्कि मन की पूर्ण विरक्ति का परिचायक था।
३. वेयविया– आगम का ज्ञाता
दीक्षा के पश्चात् आचार्य भिक्षु ने आगमों का अत्यन्त गम्भीर अध्ययन किया। प्रत्येक आगम का बार-बार स्वाध्याय किया। किसी भी विवाद या शंका का समाधान वे व्यक्तिगत मत से नहीं, बल्कि आगमिक प्रमाणों से करते थे , स्थानक वासी मुनि कुशलोजी और तिलोक जी ने आ.भिक्षु से कहा साधु को लड्डू आदि सरस पदार्थ तथा घी दूध आदि गरिष्ठ पदार्थ खाने नहीं कल्पते |उसे कौन से बच्चे पैदा करने हैं ,जो एसी वस्तुएं खायें ?स्वामी जी ने कहा देवकी के पुत्रों ने गोचरी में मोदक (लड्डू )ग्रहण किये थे आगमों में वर्णन आया है, तब तुम कैसे कह सकते हो की साधु को लड्डू खाना नहीं कल्पता ? कुशलोजी - वे तो महापुरुष थे उनकी क्या तुलना हो सकती है ? स्वामी जी -ठीक है ठीक है तुम नहीं खा सकते।जो महापुरुष होते हैं, वे तो अब भी खाते ही है इस तरह हर बार उनके निर्णय का आधार केवल आगम रहा। उनकी विद्वत्ता का प्रमाण यह भी है कि बाद में दलसुख जी मालवनिया आदि अनेक विद्वानों ने स्वीकार किया कि जैन आगमों की दृष्टि से उनका चिन्तन अत्यन्त समीचीन था।
४. अक्कोसवहम -विइत्तु धीरे — कठोर वचनों और विरोध में समभाव
उत्तराध्ययन का आदर्श भिक्षु अपमान, निन्दा और विरोध में भी विचलित नहीं होता।
आचार्य भिक्षु के जीवन में विरोधियों की संख्या अनुयायियों से भी अधिक थी। उन्हें धमकियाँ दी गईं, अपशब्द कहे गए, यहाँ तक कि नरक जाने तक की बातें कही गईं। किन्तु उन्होंने कभी क्रोध से उत्तर नहीं दिया।
१. चाहे मुख् देखने से नरक में जाने की बात हो,
२. तेरापंथी बनने वाले के पति की मृत्यु हो जाति हो|
३. पाली चातुर्मास में बाबेचा परिवार मूर्तिपूजक -जुलूस निकाला, भवन के सामने ढोल बजाने लगे, व्याख्यान में व्यवधान-श्रावक उत्तेजित-पर स्वामी जी ने कहा यह प्रतिमा को भगवान मानते हैं अतः या तो भगवान के सामने नाचते गाते हैं या भगवान के साधु के सामने तुम भला क्रुद्ध होकर इन्हें रोक क्यों रहे हो
एक व्यक्ति लगातार अपशब्द बोल रहा था। आचार्य भिक्षु ने शांत भाव से कहा—
भाई! दूर खड़े होकर बोल रहे हो, पूरी बात सुनाई नहीं देती। तुम जो कुछ कह रहे हो, मुझे लिख लेने दो ताकि मैं बाद में उसका शान्तिपूर्वक विचार कर सकूँ।
इस उत्तर ने विरोधी को ही निरुत्तर कर दिया। यह समत्व की अद्भुत मिसाल है।
तवस्सी -तपस्वी
आचार्य भिक्षु ने गृहस्थ जीवन से ही एकान्तर तप प्रारम्भ कर दिया था। दीक्षा के बाद चौविहार उपवास, आतापना और कठोर तपस्याएँ उनके जीवन का नियमित अंग बन गईं। भीषण गर्मी, लू और कठिन परिस्थितियाँ भी उनके तप में बाधक नहीं राओवरेयम चररिज्ज उत्तराध्ययन में कहा गया है कि साधु मोह के कारण अपने मार्ग से विचलित नहीं होता।
गृहत्याग के बाद जब उनके पूर्व गुरु ने लौट आने का दबाव बनाया, तब उन्होंने कहा—
'जिस दिन घर छोड़ा था, उस दिन मेरी माता भी रोई थीं; तब भी मैं आत्मकल्याण के लिए लौटा नहीं। अब मोहवश कैसे लौट सकता हूँ?'
यह कथन उनके वैराग्य और आत्मनिष्ठा का परिचायक है।
५. कोवियप्पा— आगम का परम अर्थ जानने वाला
आगम के वास्तविक मर्म को समझना ही परिपक्व भिक्षु का लक्षण है।
आचार्य भिक्षु ने तीन साध्वियों को दीक्षा के निवेदन पर-जैनागमो के नियमानुसार कम से कम तीन साध्वियां साथ रहना आवश्यक है |
आचार्य भिक्षु को प्रत्येक नियम ओरअर्थ की जानकारी थी| 1848 मे माधोपुर -दो श्रावक अपनी बात पर अड़े स्वामी जी ने तत्काल आगम संदर्भ देते हुए कहा श्रावक के त्याग देश चरित्र पर आगम में पाँच भेद हैं उसमें देश चारित्र नहीं लिया है |पूर्ण चारित्र अपेक्षित श्रावक में चरित्र आत्मा नहीं ‘स्वामी जी ने आगम के प्रत्येक अर्थ को आत्मसात कर दिया था|
आचार्य भिक्षु ने हर निर्णय आगम के मूल अर्थ के आधार पर लिया। तीन साध्वियों की दीक्षा हो या श्रावक के चारित्र का प्रश्न, उन्होंने प्रत्येक निर्णय शास्त्रीय आधार पर दिया। उनके लिए आगम केवल अध्ययन का विषय नहीं, बल्कि निर्णय का अंतिम प्रमाण था |
६. अणुविग्गए— अपमान और भय से अप्रभावित
गालियाँ, धमकियाँ, मारपीट और उपसर्ग भी उनके धैर्य को डिगा नहीं सके। उन्होंने प्रत्येक परिस्थिति में जागरूकता और समता बनाए रखी। उनके भीतर प्रतिशोध का भाव कभी उत्पन्न नहीं हुआ।
७. सव्वओ विप्पमुक्के — राग-द्वेष और आसक्ति से मुक्
आचार्य भिक्षु न किसी व्यक्ति से विशेष आसक्त हुए और न किसी के प्रति द्वेष रखा। चाहे प्रिय शिष्य खेतसीजी हों या पूर्व गुरु, सिद्धान्तों के सामने उन्होंने किसी प्रकार का पक्षपात नहीं किया। अपने जीवन के अंतिम समय में भी उन्होंने स्वर्ग की कामना नहीं की बल्कि मोक्ष को ही अपना लक्ष्य बताया | शयन, आसन, पान, भोजन विविध प्रकार के खाद्य- स्वाद्य गृहस्थ यहाँ यह राणा पंत कि यह मेरा न दे |कारण विशेष से मांगने पर भी इनकार कर तो प्रद्वेष न करे वह भिक्षु है |आचार्य भिक्षु का जीवन सैनिक का सा जीवन था जीवन संग्राम के उस विजय योद्धा को संन्यस्त |जीवन में बहुत वर्ष समस्याओं से घिरे रखकर बिताने पड़े।
▪️पाँच वर्ष तक उन्हें बराबर आहार नहीं मिला| ▪️पाली में स्थान परिवर्तन दुकानें चेंज करा दी।
▪️उदयपुर से निष्कासन -महाराणा ने उदयपुर से निष्कासन किया तब स्वामी जी के मन में द्वेष की भावना नहीं आयी।
▪️नाथद्वारा मे निष्कासन - नाथद्वारा चातुर्मार्स -वर्षा कम हुई दोष स्वामीजी पे डाल दिया।
गोसाईं जी ने मुँहपट्टी वालों को निकलने के आदेश दिया।
पाँच वर्ष तक रोटी नहीं मिली।
▪️बिलाडा में तो समाज ने प्रतिबंध -जो भिखण जी को रोटी देगा उसे प्रत्येक रोटी पर ११सामयिक दंड पर स्वामी जी विचालित नहीं हुए|
▪️तेरापंथ का नाम लेने पर घी सहित घाट भी ले ली
▪️बहनें कहती मुझे तो तेरापंथियों को देने की त्याग है |
इस प्रकार आहार, पानी, स्थान की कठिनाई आई पर स्वामी जी न कभी अभावों में त्रस्त हुए और न भावों से बद्ध| जीवन में आए संग्राम पर विजय हासिल की।
आयामगं चेव जवोदणं च, सीयं च सोवीरज वोदगं च।
नो हीलए पिंडा नीरसं तु, पंत कुलाइ परिव्वए स भिक्खू।।
एक बार स्वामीजी ने अपने संयम और समता की परीक्षा लेने का निश्चय किया। उन्होंने केर (कैर) का अत्यन्त कड़वा पानी ताँबे के लोटे में भरवाया। सामान्यतः ऐसा पानी पीना कठिन होता है, परन्तु स्वामीजी ने यह सोचकर कि साधु को स्वाद-अस्वाद, रुचि-अरुचि और सुख-दुःख में समभाव रखना चाहिए, बिना किसी संकोच या विकार के उस पानी को पी लिया।
न्होंने यह सिद्ध किया कि साधक का उद्देश्य स्वाद की तृप्ति नहीं, बल्कि शरीर-निर्वाह और आत्म-साधना है। इस घटना से उनका वैराग्य, तप, इन्द्रिय-निग्रह और समभाव उजागर होता है तथा यह प्रेरणा मिलती है कि साधक को परिस्थितियों और स्वाद के आकर्षण से ऊपर उठकर आत्मकल्याण के मार्ग पर दृढ़ रहना चाहिए। सामान्य घरों -बिलाडा में रोटी पर प्रतिबंध लगाने पर स्वामी जी ने सामान्य घर अर्थात् खाती ,कुम्हार ,जाट सेवग महाजन सभी के घरों पर गोचरी जाते थे|