क्रोध-मान त्यागें, खमत-खामणा से निर्मल होगी आत्मा : आचार्यश्री महाश्रमण

गुरुवाणी/ केन्द्र

लाडनूं। 03 अगस्त, 2026

क्रोध-मान त्यागें, खमत-खामणा से निर्मल होगी आत्मा : आचार्यश्री महाश्रमण

जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, परम धैर्यवान, महातपस्वी आचार्यश्री महाश्रमणजी योगक्षेम वर्ष के अंतर्गत चतुर्विध धर्मसंघ को पावन देशना प्रदान कर कृतार्थ कर रहे हैं। प्रातःकालीन मुख्य प्रवचन में पूज्य प्रवर ने ‘बिन सम्यक्त्व के चारित्र कहाँ?’ विषय पर आगम के आलोक में गहन दार्शनिक विश्लेषण प्रस्तुत किया।
१.'बिन सम्यक्त्व के चारित्र कहाँ?': आगम के माध्यम से पावन देशना
सम्यक्त्व और चारित्र के २ नियम–
पहला नियम: सम्यक्त्व विहीन चारित्र नहीं हो सकता। जिस प्रकार शरीर का मूल तत्व 'आत्मा' है, उसी प्रकार चारित्र का मूल आधार 'सम्यक्त्व' (सत्य पर सम्यक श्रद्धा) ही है।
दूसरा नियम : सम्यक दर्शन है तो चारित्र हो ही, ऐसा अनिवार्य नहीं है। सम्यक्त्व की अवस्था में चारित्र हो भी सकता है और नहीं भी।
सम्यक्त्व-चारित्र की चतुर्भंगी:
१.सम्यक्त्व है, चारित्र नहीं।
२.चारित्र है, सम्यक्त्व नहीं (जैसे कोई अभवी जीव साधु संस्था में रहकर केवल ऊपरी आचार पाले, पर आत्मा से सम्यक्त्वी न हो)।
३. सम्यक्त्व भी है और चारित्र भी है।
४. सम्यक्त्व भी नहीं है और चारित्र भी नहीं है।
एक साथ (युगपत्) सम्यक्त्व व चारित्र का जयाचार्यकृत न्याय:
१. आगम में दो विकल्प हैं— सम्यक्त्व और चारित्र एक साथ (युगपत्) भी आ सकते हैं या पहले सम्यक्त्व और बाद में चारित्र आ सकता है।
२. श्रीमद् जयाचार्य के न्याय का उदाहरण देते हुए आचार्यश्री ने स्पष्ट किया कि यदि छठे गुणस्थान वाले साधु के मन में संशय आने से पहला गुणस्थान आ जाए और अंतर्मुहूर्त में चेतना पुनः पुष्ट हो, तो सम्यक्त्व के साथ ही चारित्र भी एक साथ पुनः आ जाता है।
सम्यक्त्व का महत्त्व (इक्के का उदाहरण):
१. सम्यक्त्व और चारित्र दोनों मूल्यवान रत्न हैं, लेकिन सम्यक्त्व अधिक मूल्यवान है।
२.सम्यक्त्व के बिना चारित्र मृत शरीर के समान है। सम्यक्त्व वह 'इक्का' है जिसके आगे चारित्र रूपी शून्य लगाने से उसका मूल्य कई गुना बढ़ जाता है। सम्यक्त्व होने पर जीव को मोक्ष की प्राप्ति निश्चित है।
सम्यक्त्व की निर्मलता के उपाय:
१. केवलि-प्रवेदित सत्य पर दृढ श्रद्धा: जो जिनों व केवलियों द्वारा प्रतिपादित है, वही परम सत्य और निःशंक है। मनुष्य को सत्य का समर्थन करना चाहिए।
२. कषायों की मंदता : क्रोध, मान, माया और लोभ को प्रतनु और मंद रखें।
३. खमत-खामणा (क्षमापना): मिथ्यात्व से बचने के लिए मन, वचन व काया से खमत-खामणा करें और किसी के प्रति बैर या कलुषता न रखें।
५५ की तपस्या की पूर्णता एवं प्रत्याख्यान:
आचार्यश्री की मंगल सन्निधि में मुनि पारसकुमार जी ने ५५ दिनों की कठिन तपस्या की लड़ी पूर्ण होने पर प्रत्याख्यान किया। आचार्यश्री ने उन्हें मंगल आशीर्वाद प्रदान किया।
मुनि विशालकुमार जी और साध्वी सिद्धांतश्री जी ने आचार्यश्री के समक्ष आठ (अष्टम) की तपस्या का प्रत्याख्यान ग्रहण किया।