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साधना का महाकुंभ शुरू... मोह छोड़ धर्म में जुट जाइए ! : आचार्यश्री महाश्रमण
जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमण जी ने आषाढ़ शुक्ला चतुर्दशी (अनुशासन पर्व) के पावन अवसर पर उत्तरज्झयणाणि आगम के माध्यम से ‘अल्पोपधित्व’ विषय पर चतुर्विध धर्मसंघ को अमूल्य पाथेय प्रदान किया। पूज्य प्रवर ने कहा कि साधु जीवन में तेरह नियम (५ महाव्रत, ५ समितियां व ३ गुप्तियां) आराधनीय होते हैं।
अल्पोपधित्व: खुद को 'मिनिमाइज' करने का साधना सूत्र:
१.उपकरणों का सीमित उपयोग: पूज्य आचार्यश्री ने कहा कि साधु-साध्वियों के पास दो प्रकार के उपकरण होते हैं—स्वयं की निश्रित (पछेवड़ी, चोलपट्टा, रजोहरण आदि) और प्रतिहार्य (कुंडा, बाल्टी आदि)। चातुर्मास प्रारंभ होते ही साधु-साध्वियों और अग्रणियों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि वस्त्र, पात्र और थैलों का अनावश्यक संग्रह न हो।
२.लघुभूत विहार: जैसे हवा हल्की होकर बहती है, वैसे ही साधु को भी विहार में हल्का (लघुभूत) रहना चाहिए। परिग्रह और संग्रह कम होने से प्रतिलेखन आसान होता है और जीव-हिंसा की संभावना खत्म होती है। पदार्थों से आकर्षण हटाकर आत्मा से जुड़ना ही सच्ची साधना है।
चातुर्मास की महिमा और नियम-संयम का आह्वान:
१. विहार पर विराम और साधना का अवसर : आषाढ़ शुक्ला चतुर्दशी के साथ ही चातुर्मास काल प्रारंभ होता है और विहार का ताला बंद हो जाता है। एक स्थान पर स्थिरता रहने से साधु-साध्वियों को विश्राम, ध्यान और लंबी तपस्या का अवसर मिलता है, वहीं श्रावकों को भी दर्शन, सेवा और शिविर-कार्यशालाओं का लाभ मिलता है।
२. श्रावकों के लिए तप-त्याग के निर्देश : पूज्य प्रवर ने गृहस्थों को चातुर्मास में यथाशक्ति तपस्या, नवकारसी, पोरसी, एकासन करने और कम से कम दो माह रात्रि भोजन का पूर्ण त्याग तथा जमीकंद का वर्जन करने की प्रेरणा दी।
३. स्थापना दिवस और आषाढ़ी पूनम : आचार्यश्री ने स्मरण कराया कि कल आषाढ़ी पूर्णिमा तेरापंथ स्थापना दिवस है, जो स्वामी भिक्षु की नव्य-भव्य दीक्षा का ऐतिहासिक दिन है।
हाजरी वाचन व त्रिपदी वंदना: अनुशासन पर्व के अवसर पर पूज्य आचार्यश्री ने हाजरी का वाचन करते हुए विविध प्रेरणाएं दीं।