गुरुवाणी/ केन्द्र
सेवा, श्रम और ज्ञान दान भी तपस्या का उत्कृष्ट रूप :आचार्यश्री महाश्रमण
जैन विश्व भारती में आयोजित दो दिवसीय समारोह के समापन तीर्थंकर के प्रतिनिधि, युगप्रधान, पूज्य आचार्य श्री महाश्रमण जी ने उत्तराध्ययणाणि आगम से पावन देशना दी।
'तप से तापस होता है':
उत्तराध्ययणाणि आगम से पावन देशना
पूज्य आचार्यश्री ने जीवन की भौतिक-आध्यात्मिक उपलब्धियों, भाग्य के भेदों और तप के गूढ़ रहस्य का विस्तृत विश्लेषण किया।
१. साधना का मूल सूत्र : समता से आदमी श्रमण (समन) बनता है, ब्रह्मचर्य से ब्राह्मण बनता है, ज्ञान से मुनि और तप से तापस बनता है। जीवन में तप की तेजस्विता होना भी एक महान उपलब्धि है।
कर्म क्षयोपशम और तीन मुख्य युग्म:
विद्वत्ता और बुद्धिमत्ता: मनुष्य में बौद्धिक क्षमता, विद्वत्ता और तीक्ष्ण बुद्धि का होना ज्ञानावरणीय कर्म के क्षयोपशम से संबद्ध होता है।
सत्ता और वर्चस्विता : व्यक्ति में तेज और पुण्य का योग होने पर उसे सत्ता, वर्चस्विता, मान-सम्मान और समाज में प्रतिष्ठा प्राप्त होती है।
धनिता और स्वस्थता : गृहस्थ जीवन में धनवान होना और साधु हो या गृहस्थ—शारीरिक स्वास्थ्य की अनुकूलता पाना, यह सब पुण्य के उदय की स्थितियां हैं।
मूर्त और अमूर्त भाग्य का चिंतन:
१. मूर्त भाग्य : यह कर्मों के उदय भाव और पुण्य के योग से जुड़ा होता है, जो भौतिक अनुकूलताएं देता है।
२. अमूर्त भाग्य : यह औपशमिक व क्षायोपशमिक भाव से प्राप्त होता है, जो आत्मा का वास्तविक और आध्यात्मिक विकास करता है।
तप का व्यापक और व्यावहारिक स्वरूप:
बाह्य तप का अपना प्रभाव होता है और साधु स्वयं को संयम व तप से भावित करता है। केवल उपवास आदि ही तप नहीं हैं, बल्कि सेवा करना, श्रम करना, साधना करना और किसी को ज्ञान का दान देना भी तपस्या का ही उत्कृष्ट रूप है। क्षेत्र और काल के अनुसार विवेकपूर्वक तप का चयन करना चाहिए।
युवाचार्य श्री के प्रति पूज्य प्रवर की
मंगल भावनाएं :
सहवर्ती के रूप में युवाचार्य श्री की निष्ठा और क्षमताओं की आचार्य श्री ने खुलकर सराहना की।
१.सेवा व कार्य क्षमता: युवाचार्य महावीर ने सेवा का कार्य भी किया है। हर अग्रणी को महावीर जैसा सहवर्ती मिल जाना भाग्य की बात होती है। श्रम करना भी एक प्रकार का तप है और शासन-प्रशासन का कार्य भी सेवा का ही रूप है, जिससे साध्वी प्रमुखा व साध्वीवर्या जी भी जुड़ी हुई हैं।
२. गुरु-छाया और दायित्व : आचार्य के बाद युवाचार्य होते हैं। गुरु की छाया व सानिध्य में रहना सौभाग्य की बात है।
युवाचार्य महावीर को स्वाध्याय का जितना समय मिलता जाए, उससे ज्ञान और पुष्ट हो सकता है। वे पहले मुख्यमुनि के रूप में संघीय कार्यों और संदेश लेखन से जुड़े रहे हैं, जो अब नैष्कर्म्य और ऊर्ध्वारोहण की स्थिति में आ गया है।
३. मंगल आशीर्वाद: द्रव्य, क्षेत्र, काल और भाव के अनुसार युवाचार्य जी सदैव तैयार रहें। उनकी मानसिक समाधि, खूब सक्रियता, मनोबल और विनम्रता बनी रहे। वे स्वास्थ्य का ध्यान रखते हुए स्वाध्याय, व्याख्यान अभ्यास और शासन-प्रशासन के कार्यों पर दृष्टि रखें तथा निरंतर आगे बढ़ते और फलते-फूलते रहें।
गुरु चरणों में युवाचार्य श्री की विनयपूर्ण अभिव्यक्ति:
युवाचार्य श्री ने पूज्य गुरुदेव के प्रति पूर्ण समर्पण और विनय भाव व्यक्त किया।
समर्पण भाव: 'मैं सदैव पूज्य गुरुदेव के चरणों व शरण में हूँ। आचार्य प्रवर का मंगल आशीर्वाद, मंगल साया और मंगल कृपा दृष्टि सदैव मिलती रहे। गुरुदेव ने जो प्रेरणाएं दी हैं और साधु-साध्वियों ने जो बातें निवेदित की हैं, उन सभी गुणों से मैं संपन्न बन सकूँ, यही मेरी मंगल कामना है।'
चारित्रात्माओं एवं संस्थाओं द्वारा भावभरी वर्धापना:
चतुर्विध धर्मसंघ, साध्वीवृंद और मुनिवृंद ने गीतों व विचारों से युवाचार्य श्री का अभिवंदन किया।
१.साध्वीवर्या जी की अभिव्यक्ति: उन्होंने कहा कि परम पूज्य आचार्य प्रवर ने मुख्यमुनि श्री महावीर कुमार जी को युवाचार्य के रूप में प्रतिष्ठित किया है। गुरु आशीर्वाद से अभिभूत युवाचार्य प्रवर की वर्धापना करते हुए उन्होंने सुमधुर गीत का संगान किया।
२.साध्वीवृंद के वक्तव्य: शासन गौरव साध्वी कनकश्री जी (लाडनूं), शासन गौरव साध्वी कल्पलता जी, शासन श्री साध्वी जिनप्रभा जी एवं साध्वी चरितार्थप्रभा जी ने अपनी भावाभिव्यक्ति दी।
३.गीत संगान व प्रस्तुतियां: मुनिवृंद, मुमुक्षु बहनों तथा अनेकानेक मुनि प्रवर, साध्वी व समणी वृंद ने गीतों के माध्यम से वर्धापना दी।
४. संसारपक्षीय परिवार : युवाचार्य श्री के संसार पक्षीय भाई लोकेश कोचर ने अपनी अभिव्यक्ति दी।
'तेरापंथ टाइम्स' का लोकार्पण :
अभातेयुप के पदाधिकारियों द्वारा पूज्य आचार्य श्री के समक्ष भिक्षु त्रिजन्मशताब्दी पूर्णाहुति अंतर्गत 'तेरापंथ टाइम्स' के विशेषांक का भावपूर्ण लोकार्पण किया गया।