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युवराजा! तुम्हें मेरा प्रणाम...
तेरापंथ धर्मसंघ में नित्य नवीनता के दर्शन होते हैं। विशाल धर्मसंघ है और श्रेष्ठ नेतृत्व है। तेरापंथ की गुरु-परंपरा बहुत प्राणवान है। फिर शिष्य-परंपरा शक्तिशाली क्यों नहीं होगी? परमपूज्य अष्टमाचार्य श्री कालूगणी ने शिष्यों को उत्प्रेरित करते हुए कहा था - शिष्य समुदाय को आचार्य पद की अर्हता का विकास करना चाहिये। हमारा धर्मसंघ सचमुच विकासशील है। इसका सारा श्रेय कुशल नेतृत्व को जाता है।
हमने अपनी आंखों से निहारा कि परमपूज्य युगप्रधान आचार्य श्री महाश्रमणजी ने अपने सुशिष्य को युवाचार्य पद पर आसीन किया! गौर वर्ण, भव्य ललाट, मनोहर मुद्रा और कल्याण भावना से ओतःप्रोत एक मनस्वी सन्त ने पदारेाहण किया! सद्भावना का अंबार लग गया और धर्मसंघ की तेजस्विता में चार चांद लग गये। ऐसे प्रसंग अन्तःकरण को आलोकित कर देते हैं तथा शुभ भविष्य का निर्माण कर देते हैं। मुझे श्रद्धेय युवाचार्य प्रवर का बहुत सान्निध्य मिला है तथा श्रुताराधना में अपूर्व सहयोग मिला है। मैं (मुनि कल्प कुमार) उनके मुख्य मुनि काल में प्रथम बेच का मुमुक्षु बनने का सौभाग्य पा सका, इसका मुझे बड़ा हर्षोल्लास है। मेरे विद्या-विकास में आपका बहुत श्रम और आशीर्वाद रहा है। मेरे अध्ययन में आपकी श्रेष्ठ भूमिका कही जा सकती है। उनकी पावन सन्निधि में मुझे पंच सूत्रम, शान्त सुधारस, सिन्दूर प्रकर, जैन तत्त्व प्रवेश, संस्कृत चौबीसी, कालू तत्त्व शतक आदि अनेक चीजें सीखने का सौभाग्य मिला तथा साधु प्रतिक्रमण भी मैंने आपश्री के पास सीखा था। आपकी यह सद्प्रेरणा मेरे कानों में गूंज रही है कि तुम्हें एक श्रेष्ठ अध्ययनशील साधु बनना है। उनकी यह आशिष मेरे भीतर पल रही और फल रही है। पूज्यवरों की महान अनुकंप और अनुग्रह से मुझे अशेष मुनि मदन कुमारजी स्वामी का मार्ग दर्शन मिल रहा है जो मेरे जीवन को संवार रहा है तथा ज्ञान को हृद्गत कर रहा है। गुरु-कृपा से दुर्लभ संयोग मिल जाते हैं और आध्यात्मिक विकास के द्वार खुल जाते हैं। अपने भीतर विनम्रता, सहिष्णुता और तुलना के विकास की अहर्निश मंगल भावना करता हूँ।