रचनाएं
अभिनंदनीय नवोदित युवाचार्यप्रवर
महामना परमपूज्य आचार्य श्री भिक्षु के त्रिशताब्दी वर्ष की परिसंपन्नता का परम पावन अवसर और अप्रतिम क्षण। धर्मसंघ की ओर से बोधि दिवस का आयोजन। परम पावन-महाकृपालु आचार्य श्री महाश्रमणजी ने अपने युवाचार्य का मनोनयन किया। श्रद्धेय युवाचार्यप्रवर सबके अभिनंदनीय और आराध्य बन गये। भिक्षु-शासन की यह सुंदरतम व्यवस्था है।
हमारे जीवन में तीन बार युवाचार्य मनोनयन के प्रसंग आये हैं। सन् 1979 में परमपूज्य आचार्य श्री तुलसी ने युवाचार्य श्री महाप्रज्ञ का, सन् 1997 में परमपूज्य आचार्य श्री महाप्रज्ञ ने युवाचार्य श्री महाश्रमण का, और सन् 2026 में परमपूज्य आचार्य श्री महाश्रमण ने युवाचार्य श्री महावीर का मनोनयन किया। जब-जब ऐसे प्रसंग आये हैं, धर्मसंघ को अद्वितीय ऊंचाई मिली है तथा धर्मसंघ में आनन्द छाया है।
महामहिम आचार्य श्री तुलसी ने अपने जीवन के 65 वें वर्ष में युवाचार्य मनोनयन किया और परम पूज्य आचार्य श्री महाश्रमण ने भी अपने जीवन के 65 वें वर्ष में युवाचार्य मनोनयन किया। श्री तुलसी गणी की तरह श्री महाश्रमण गणी ने भी प्रायः गोपनीय ढंग से युवाचार्य श्री का मनोनयन किया।
परमाराराध्य आचार्य श्री तुलसी की तरह आचार्य श्री महाश्रमणजी ने भी अपने नव मनोनीत युवाचार्य प्रवर को अपने पट्ट पर आसीन किया। परमपावन आचार्य श्री तुलसी ने अपने युवाचार्य मनोनयन के लिये मर्यादा - महोत्सव का दिन चुना और परम कृपालु आचार्य श्री महाश्रमण ने अपने युवाचार्य मनोनयन के लिये आचार्य श्री भिक्षु का जन्म दिन (बोधि दिवस) चुना।
सन् 2001 में परमपूज्य युगप्रधान आचार्य श्री महाप्रज्ञजी के पावन सान्निध्य में मर्यादा महोत्सव गंगाशहर में था। उन दिनों श्री सवाईचंदजी कोचर को गाते हुये सुना था, अच्छा और जोशीला गा रहे थे। तब यह मेरी (मुनि मदन कुमार) धारणा बनी कि पिता - पुत्र अच्छे संगायक है तथा कंठ कला मर्मज्ञ है।
तेरापंथ धर्मसंघ की संगीत कला अद्भुत और विलक्षण रही है। परमपूज्य आचार्य श्री भिक्षु स्वामी, जयाचार्य, कालुगणी और तुलसी गणी का तो कहना ही क्या? वे सचमुच संगीत सम्राट थे और तानसेन को भी मात करने वाले थे। हमारा विश्वास है कि युवाचार्य प्रवर भी संगीत के क्षेत्र में कीर्तिमान बना सकेंगे। आपका तेरपंथ स्थापना को दिवस पर उद्बोधन सुना तब लगा कि आप सचमुच प्रज्ञा पुरुष हैं और प्रज्ञा के पुरस्कर्त्ता बनेंगे। आप भाग्यशाली हैं, क्षयोपशम प्रबल है और विनम्रता के प्रतीक पुरुष हैं।
सिवाणची मालाणी की पावन धरा के फलसुण्ड गांव के श्री सवाईचंदजी कोचर और श्रीमती छगनी देवी कोचर के गृहांगन में एक नररत्न पैदा हुआ और वह धर्मसंघ का भाल बन गया।
मेरे अनन्य सहयोगी मुनि संयम कुमारजी और मुनि कल्प कुमारजी बोले - काश! हम भी वहां होते तो योगक्षेम - वर्ष का आनंद लेते और युवाचार्य मनोनयन का अद्भुत नजारा साक्षात् देख पाते। ऐसी उत्तम भावना भी निर्जरामूलक होती है। परमश्रद्धेय आचार्यप्रवर और युवाचार्यप्रवर को शत - शत बधाई तथा अन्तःकरण की कामना है कि यह जोड़ी अमर रहे। एक पद्य के साथ इस महायुगल की अभिवंदना कर रहा हूँ –
सिद्ध पुरुष की सिद्ध वाणी, सफल हुई साकार।
महाश्रमण महावीर की जोड़ी, युग युग जय जयकार ।।