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युवाचार्य-अभिवंदना
संघ के भव्य नव्य एवं दिव्य पारिजात युवाचार्य प्रवर! आज 'युवाचार्य प्रवर' यह नव्य संबोधन लिखकर मन हर्षोल्लास से पुलकित है, प्रमुदित है। युवाचार्य के रूप में आपश्री का वर्धापन करते हुए मेरे हृदय में आनन्द का अर्णव लहरा रहा है। आपश्री की मोहिनी मुरत अध्यात्म की परम पुनीत सूरत लग रही है।
कमनीय कान्तिधर युवाचार्य प्रवर! आप जैसे शौर्य, वीर्य, गाम्भीर्य युक्त व्यक्तित्व को युवराज पद पर प्रतिष्ठित कर गुरु महाश्रमण ने भिक्षुशासन के विकास की नई ऋचाएं लिख दी है। संघ के सौभाग्य को शतगुणित कर दिया है। गुरु महाश्रमण की पारखी नजरों ने संघ मुकुट पर एक दमकता - चमकता कोहिनूर हीरा स्थापित कर दिया है। आप सदैव संघ क्षितिज पर तेजस्विता के साथ तेजस्वी आभावलय से सम्पृकत होकर संघ आकाश को तेजोमय बनाते रहें, यह हमारी मंगलकामना है।
समर्पण के शिखरपुरुष युवाचार्य प्रवर! आपश्री के विनय का वैनतेय सर्वदा गारूड़ी गति से संघ को शिखरों पर चढ़ाता रहे। आपके समर्पण का सिंधु संघ- समन्दर में नए मोती निपजाता रहे। आपश्री की गुरुभक्ति, संघभक्ति तेरापंथ के नंदनवन को सुरभित करती रहे। आप वर्धमानता के शिखरों का आरोहण करते रहें। श्रेष्ठ श्रुताराधक युवाचार्य प्रवर! आपकी बहुश्रुतता सतत वृद्घिंगत रहती हुई संघ में श्रुतपावनी श्रुतधारा का वर्षण करती रहे। संघ के सभी सदस्य आपसे प्रेरणा प्राप्तकर ज्ञान-सरिता में अवगाहन करते रहें। विनय, समर्पण की आपसे प्रवाहित सुरसरिता हम सब साधु-साध्वियों में विनय एवं समर्पण के बीजों को पल्लवित, पुष्पित एवं फलवान बनाती रहे। आपके उज्वलतम भविष्य की अनन्त-अनन्त मंगलकामना।
काश! हम भी साक्षात वहां उपस्थित होकर इन अद्भुत क्षणों का अनुभव करते। किन्तु, दूरस्थ संचार माध्यम से जब वह स्वर्णिम नजारा देखा, ऐसा लगा कि मानो हम श्रीचरणों की ऊर्जामयी सन्निधि में पहुंच गए हैं। शिवांची-मालाणी भी आपश्री जैसे सपूत को पाकर अपने आपको गौरवान्वित अनुभव कर रही है। यहां हर व्यक्ति का मन-मयूर उत्साह एवं उल्लास से नाच रहा है। इसका मैं साक्षात अनुभव कर रही हूँ। मैं यह भी अपना भाग्य मानती हूँ कि इस समय मैं सिवांची मालाणी क्षेत्र में हूँ। यहाँ पर आचार्य श्री एवं आपश्री के प्रति श्रद्धा के भावों को देखने का अवसर मिल रहा है। सैकड़ों-सैकड़ों लोग अभ्यर्थना हेतु सिवांची मालाणी से लाडनूं श्री चरणों में पहुँच रहे हैं। पूज्य युवाचार्य प्रवर मेरे भावों को शब्दों के माध्यम से ही आपश्री तक पहुँचा सकती हूँ, किन्तु ऐसा लग रहा है मेरी हर्षयुक्त इन भावनाओं के भार को ये शब्द वहन करने में समर्थ नहीं हैं। पुन: वन्दना! आपश्री की यशोगाथा निरंतर बढ़ती जाए। धर्मसंघ की श्रीवृद्धि करते रहें। आपश्री निरामय रहें। दीर्घकाल तक गुरुदेव आचार्य श्री महाश्रमण जी की शुक्ल-सन्निधि में ही संघ की गौरववृद्धि करते रहें।
हृदयस्थ अनंत-अनंत मंगलकामनाएं!