रचनाएं
गुरुवर त्रिभुवन तिलक, परम तितिक्षावान
गुरुवर त्रिभुवन तिलक, परम तितिक्षावान
युवाचार्य को प्रकट कर, दिया संघ वरदान ॥
निरभिमानता योग से, स्व आभा विकसाई
गुरु दृष्टि, सृष्टि बनी, गण में ख्यात खताई ॥
करुणा, समता, शुभ्रता, गण उन्नति संज्ञान
श्रेष्ठ श्रुताराधक बने, बढ़ी संघ की शान ॥
हम सबके आदर्श हैं, निश्छलता सरसाई
महर नजर हम पर सदा, हर पल रहे सवाई ॥
मन भावों वन्दन करूं, भावी गण सरताज
ह्रत तंत्री अभ्यर्थना, स्वीकारो युवराज ॥