महावीर परंपरा के युवाचार्य महावीर

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डॉ साध्वी परमयशा

महावीर परंपरा के युवाचार्य महावीर

जिनकी हर भोर जागरूकता के साथ शुरू होती है और हर शाम रचनात्मक उपलब्धियों से भरी होती है। आचार्य महाश्रमण जिनके आवास विश्वास दीप हैं, जिनके भीतर उत्तेजना का switch off और शांति, समता, सहजता व सरलता का switch on रहता है। जो महावीर की परंपरा के यशस्वी युवाचार्य होकर नया सृजन, नए आलेख और नई रेखाएं खींचेंगे; क्योंकि शांतिदूत महातपस्वी गुरुदेव की छत्रछाया उनके साथ है। कई रोचक आंकड़े युवाचार्य महावीर की गौरव-गरिमा को सहस्रगुणित करते हैं।
तेरापंथ के नवम युवाचार्य
युवाचार्यों की परंपरा में मुख्य मुनि महावीर से युवाचार्य महावीर के रूप में एक नयी कड़ी जुड़ गयी। आचार्य महाश्रमण जो भी करते हैं, नया सोचते हैं और अपने विचारों से दुनिया को रोमांचित कर देते हैं। नौ का अंक अक्षय होता है। युवाचार्य महावीर भी नौ के अंक से अक्षय अचल हस्ताक्षर बन गए हैं।
भिक्षु बोधि दिवस पर नया इतिहास
भिक्षु बोधि दिवस बोधिलाभ का प्रेरणास्पद पृष्ठ है, जिसे आचार्य महाश्रमण ने बहुआयामी बना दिया। मुख्यमुनि को उसी दिन युवाचार्य बनाकर बोधि दिवस का पुनर्जन्म कर दिया। इस अभूतपूर्व दृश्य को देखकर सभी का मस्तक श्रद्धा से नत हो गया।
सिवांची मालाणी की धन्य धरा
आचार्य प्रवर ने सिवांची मालाणी की वसुंधरा को विस्मित कर दिया। जब इस धरा के सुकुमार युवा संत प्रथम युवाचार्य बने, तो यह भूमि गर्व से धन्य हो गयी, जिसके वीर सपूत ने सिवांची मालाणी के प्रांगण में स्वास्तिक रच दिए।
धन्य हैं माता-पिता
फलसूंड के माता-पिता का यह परम सौभाग्य है कि उनके आंगन में कल्पवृक्ष तुल्य बाल-गोपाल का जन्म हुआ, जो आचार्य महाश्रमण की शरण में भावी भाग्य-विधाता बन गया।
वे प्रथम माता-पिता हैं जिन्होंने अपने पुत्र को विकास के क्षितिज छूते, विदेश यात्रा करते, Ph.D. प्राप्त करते, मुख्य मुनि के रूप में और आचार्यश्री के साथ पट्ट पर आसीन देखा। मां का पल्लू पकड़कर चलने वाला महावीर, आज महाश्रमणजी की परछाई बन चुका है।
प्रथम श्रेष्ठ श्रुताराधक अलंकरण
मुनि महावीर ‘श्रेष्ठ श्रुताराधक’ अलंकरण से सम्मानित होकर समग्र संघ के लिए श्रद्धास्पद बन गए। शिक्षा के क्षेत्र में स्वर्णपदक से सम्मानित प्रथम युवाचार्य संघ के प्राण बन चुके हैं।
तेरापंथ की राजधानी लाडनूं हुई धन्य
लाडनूं को तेरापंथ की राजधानी का यश तब मिला जब मुख्य मुनि को युवाचार्य पदवी इसी पावन भूमि पर मिली। यह गौरव तुलसी गुरुदेव की जन्मभूमि को प्राप्त हुआ।
जैन विश्व भारती संस्थान और योगक्षेम वर्ष को भी यह सौभाग्य मिला। योगक्षेम वर्ष आचार्यश्री के शासनकाल की महान उपलब्धि है, जिसमें 30 संत, 378 साध्वीजी और 50 समणीजी की सहभागिता एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। आचार्यश्री ने युवाचार्यश्री को प्रथम प्रभात से ही लब्धियों व सिद्धियों का खजाना प्रदान किया।
विदेश की धरा को मापा दो पैरों से
आचार्यप्रवर के सहयात्री युवाचार्य महावीर भारत से बाहर विदेशों में भी पदयात्रा करने वाले प्रथम यायावर हैं। भूटान, नेपाल, काठमांडू आदि क्षेत्रों के लोग उन्हें पाकर प्रफुल्लित हैं।
बहुश्रुत परिषद् के संयोजक
बहुश्रुत परिषद् के सर्वसर्वा आचार्य प्रवर हैं। इसमें संयोजक पद प्रदान कर आचार्यश्री ने युवाचार्य की गरिमा बढ़ा दी। इस गरिमामयी परिषद् का संयोजक युवाचार्य पद पर मनोनीत हो, यह महातपस्वी की महान देन है।
महावीर पाठशाला हुई गौरवान्वित
आचार्यप्रवर ने मुख्यमुनि को महावीर पाठशाला का नेतृत्व सौंपा था। जब इसके संयोजक प्रथम युवाचार्य पद पर मनोनीत हुए, तो विद्यार्थियों व संतों का रोम-रोम पुलकित हो उठा। धर्मसंघ में उल्लास का सैलाब है
आचार कुशलता का जिनके पास है Nutrition...
गण गाणि निष्ठा का जिनके साथ है प्रशिक्षण
बाहुश्रुत्य नैपुण्य का प्रकाश है यह मनोनयन
चिरायु शतायु हो युगल जोड़ी के दुर्लभ क्षण॥