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सर्वांन्गुणानेष गुणो विभाति
प्रश्न है कि बड़ी कंपनियां, संस्था, संगठन में किसी को सर्वोच्च पद देते समय क्या देखा जाता है?
समाधान में कहा गया कि - किसी को बड़ा पद, सर्वोच्च स्थान देते समय चयन करने वाला दो 'C' को देखता है।
(i) प्रथम 'C' = Competence अर्थात सामने वाले की निजी योग्यता।
(ii) दूसरा 'C' = Comfort अर्थात नियुक्ति करने वाला आपके साथ आसानी से काम कर सके।
कहने को तो Competence प्रथम शर्त रखी गई है जो सही भी है। परंतु व्यावहारिक रूप से दूसरी शर्त Comfort प्रमुख है। इसके बिना आपकी योग्यता महत्वपूर्ण तो बहुत है पर उस व्यक्ति के कतई काम की नहीं जो आपको नियुक्त कर रहा है। इन दो विशेषताओं के साथ कुछ और गुण हों जैसे (i) ईमानदार हो (ii) अथक परिश्रम करने वाला हो (iii) गांभीर्य हो (iv) लोगों के बीच जुड़ा रहे (v) स्वयं कुछ कर गुजरना चाहता हो।
कोई भी किन्तु Comfort सबसे पहले और सबसे अधिक देखेगा।
तभी कहा भी गया है कि - 'बहुत सारे लोगों के द्वारा पहचाने जाने से तो कुछ लोग हमें चाहते हों यह अच्छा है। और कुछ लोग हमें चाहे उससे भी अच्छा यह है कि एक महान-श्रेष्ठ व्यक्ति के हम प्रेमपात्र-विश्वासपात्र और प्रिय पात्र बन जाएं।'
(2)नवमनोनीत युवाचार्यवर के जीवन में यह बात शत प्रतिशत परिलक्षित हो रही है कि वह परम पूज्य आचार्य प्रवर के लिए Comfort है और आचार्य श्री के दिल में प्रेमपात्र - विश्वासपात्र व प्रियपात्र के रूप में अंकित हो गए हैं। वे अब comfortable महावीर बन गए हैं।
विदुर नीति में कहा गया है -
अष्टौ गुणाः पुरुषं दीपयन्ति, प्रज्ञा च कौल्यं च दमः श्रुतं च।
पराक्रमश्चाबहुभाषिता च, दानं यथाशक्ति कृतज्ञता च।।
अर्थात् प्रज्ञा, कुलीनता, दम, श्रुत, पराक्रम, मितभाषिता, दान और कृतज्ञता यह आठ गुण जिसके जीवन में स्थिर है उसका जीवन दीप्तिमान है। उससे भी आगे कहा गया है -
एतान् गुणांस्तात महानुभावानैको गुणः संश्रयते प्रसह्य।
राजा यदा सत्कुरुते मनुष्यं, सर्वांन्गुणानेष गुणो विभाति।।
अर्थात् ऊपर बताएं सब गुणों से भी एक गुण ऐसा है जो व्यक्ति को विशिष्टतम रूप से दैदीप्यमान करता है वह गुण है - राज सम्मान अर्थात् राजा की ओर से सम्मानित करना।
तेरापंथ धर्मसंघ के सरताज आचार्य श्री महाश्रमण जी के द्वारा युवाचार्य बनाने के साथ-साथ हमने देखा कि अपने पट्ट पर युवाचार्यश्री को बिठाना उनका सर्वाधिक सम्मान है। ऐसे विनम्र, सहज, सरल, सेवाभावी, शांत, सद्गुणों के भंडार भावी आचार्य को पाकर संपूर्ण तेरापंथ समाज अपने में गर्व का अनुभव कर रहा है। इस गर्वानुभूति के क्षणों में एक घटना याद आती है कि - ‘मंदिर की सालगिरह का दिन था। दर्शनार्थियों की भीड़ लगी। उस भीड़ में एक अंधा व्यक्ति भी था। लोगों की धक्का-मुक्की से गिर गया, खड़ा हुआ, चला। रास्ते में पत्थर से टकराया और फिर गिर पड़ा। पुनः चला। उसे चलता देख किसी ने पूछा कि- 'तुम अंधे हो, देख नहीं सकते फिर भी भगवान् के दर्शनार्थ क्यों दौड़ता है? क्या तुम भगवान् को देख पाओगे?' उस अंध व्यक्ति ने उत्तर दिया कि- 'मैं अंधा हूँ इसलिए चाहे भगवान् के दर्शन नहीं कर पाऊँ, परन्तु भगवान् तो अंधे नहीं हैं ना! भगवान् की दृष्टि मेरे पर गिर जाएगी तो काम हो जाएगा , मैं न्यार हो जाऊंगा।
अतः युवाचार्य श्री के चरणों में वर्धापन की श्रेणी में यह भावांजलि है कि - आपश्री का साक्षात् वर्धापन करने का मुझे सौभाग्य नहीं मिला है। परन्तु समर्पण भाव से इतनी-सी ख्वाइस है कि आपश्री की कृपादृष्टि हम तक भी पहुँच जाएगी तो हमारा काम हो जाएगा। मैं धन्य-धन्य बन जाऊँगा।