रचनाएं
महाश्रमणप्रभु भाग्य विधाता
महाश्रमणप्रभु भाग्य विधाता, कैसे भाग्य सजाते
गण गुलशन फूल खिलाते, हम अपना भाग्य सराते॥
फलसुण्ड धरा पर झोपड़ी में जन्मे रोशनी लेकर
कोचर कुल का कच्चा प्रांगण बांटे पताशा घर घर
महावीर युवराज बने है, मंगल घोष सुनाते
हम अपना भाग्य सराते॥
पिता सवाईचन्द के लाल दुलारे माँ छग्गनी के लाल
जन्मभूमि फलसुण्ड का तुमने किया ऊंचा भाल
मोह माया का बंधन तोड़ा संयम पथ अपनाते॥
हम अपना भाग्य सराते॥
भोला भाला महावीर बालक, महाप्रज्ञ चरण में आया
शिल्पिकार बन महाश्रमण ने मुनि का रूप सजाया
युवाचार्य की कर नियुक्ति गण गौरव शिखर चढाते
हम अपना भाग्य सराते॥
त्रिशताब्दी पावन अवसर, गण को किया निहाल
युवाचार्य चयन मनभावन, दिव्य चमकता भाल
शुभभावों से वर्धापन कर, मंगल तिलक लगाते
हम अपना भाग्य सराते॥
युवाचार्य मनोनयन का, अद्भुत दृश्य दिखाया
जय नारों से गूंजी धरती, नव उल्लास छाया
आई आज दीवाली गण में, सुर-नर शंख बजाते।
हम अपना भाग्य सराते॥
विनय समर्पण सहज सरलता गुरु, दिल में स्थान जमाया
आज्ञा सेवाभाव तुम्हारा संघ में सबको लुभाया
मेधावी प्रतिभा प्रज्ञा लख, हर्षित पुलकित शीश नमाते
हम अपना भाग्य सराते॥
भिक्षु शासन नन्दनवन की स्वस्थ परम्परा न्यारी
युवाचार्य आचार्यप्रवर की जोड़ी लगती प्यारी
कोड़, दीवाली तपो धरा पर अभिवंदन कर हरसाते, हम अपना भाग्य सराते।
वर्धापना कर पाते, मंगल घोष सुनाते, हम शत शत बार बधाते॥
तर्ज – जहां डाल डाल पर