छलक रहा भावों का दरिया

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शासनश्री साध्वी सुमनश्री

छलक रहा भावों का दरिया

छलक रहा भावों का दरिया, वर्धापन का गीत सुनाए ।
सारे उत्सव एक हो गये, सौ सौ ये सावन लहराए।।
महाप्राण श्री महाश्रमण ने पल-पल करुणा रस से सींचा,
दिव्य दृष्टि से परख निरब्व कर भावी का नक्शा है खींचा,
कर कमलों से सिंचित कृति में अद्‌भुत सूरज चाँद उगाए।।
स्फटिक तुल्य यह आभामंडल देख-देख मन मुदित हुआ है,
संघ शिखर पर जैसे कोई स्वर्णिम सूरज उदित हुआ है,
सतरंगी किरणों ने अभिनव उजले उजले छंद रचाए।।
रोम-रोम सब आँख हो गई, साखी ज्यों कबीरा की,
पौर-पौर रस पूरित पाई खुशियां सकलधरा की,
यह बासंती मौसम मानो सुधाचांदनी रस बरसाए।।
पुण्य अर्चना के अवसर पर श्रद्धा का मैं अर्घ्य चढ़ाऊं,
संकल्पों की दिव्य ज्योति से पल-पल तुमसे ऊर्जा पाऊं।
प्रभो! प्रणत्त हम श्री चरणों में संकेतो पर कदम बढ़ाए।।