ना डिग्री का काम, ना पैसे का खेल... 'सेवा और विनय' से होगा किस्मत का मेल : आचार्यश्री महाश्रमण

गुरुवाणी/ केन्द्र

लाडनूं। 10 अगस्त, 2026

ना डिग्री का काम, ना पैसे का खेल... 'सेवा और विनय' से होगा किस्मत का मेल : आचार्यश्री महाश्रमण

जैन श्वेतांबर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, अखण्ड परिव्राजक, भगवान महावीर के प्रतिनिधि, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमण जी ने मुख्य प्रवचन में ‘शुश्रुषा से क्या मिलेगा?’ विषय पर उत्तरज्झयणाणि आगम के आधार पर चतुर्विध धर्मसंघ को पावन देशना प्रदान की।
'शुश्रुषा' का वास्तविक अर्थ और गुरु-साधर्मिक का स्थान–
१. अज्ञान का निवारण : धार्मिक और व्यावहारिक दोनों क्षेत्रों में गुरु का स्थान सर्वोच्च है। सद्गुरु आध्यात्मिक ज्ञान के प्रकाश से अज्ञान रूपी अंधकार को मिटाते हैं और स्वयं त्याग व संयम के मार्ग पर चलते हैं।
२. शुश्रुषा का गहरा अर्थ : 'शुश्रुषा' का एक प्रमुख अर्थ है—सुनने की इच्छा रखना। यह व्यक्ति और बुद्धि दोनों का महान गुण है। जब हमारे सम्मान्य गुरु, वृद्ध या साधर्मिक कुछ कहें या उपदेश दें, तो उसे पूर्ण ध्यानपूर्वक सुनना चाहिए। उस समय मन को अन्य कार्यों से हटाकर पूरी तरह से सुनने में लगाना ही सच्चा विनय है।
३. साधर्मिक कौन? : जो एक धर्मसंघ, एक समाचारी, एक गुरु परंपरा और समान सिद्धांतों का पालन करते हैं, वे साधर्मिक बंधु हैं। उनकी बात सुनना और आवश्यकता पड़ने पर उनकी सेवा-परिचर्या करना सौभाग्य की बात है।
सेवा, विनय और तेरापंथ की महान परंपराएं–
१. उत्साह से हो सेवा : जो साधर्मिक या वृद्ध सेवा-परिचर्या के योग्य हैं, उनकी सेवा का अवसर मिलना बड़े सौभाग्य की बात है। सेवा दायित्व समझकर नहीं, बल्कि पूरे उत्साह और भाव के साथ होनी चाहिए।
२. छोटे-बड़े का विवेक : छोटे युवाओं को बड़ों के प्रति सदैव विनय भाव रखना चाहिए, वहीं बड़ों को भी छोटों की बात ध्यान से सुननी चाहिए। तेरापंथ धर्मसंघ में पाक्षिक (पक्खी) के दिन वंदना करने और परस्पर 'खमत-खामणा' (क्षमापना) करने की विशेष और विलक्षण परंपरा है।
'शुश्रुषा से क्या मिलेगा?': दुर्गति से बचाव और महान उपलब्धियां:
१. बिना डिग्री के सबसे बड़ी उपलब्धि : शुश्रुषा से जीवन में 'विनय' का प्रादुर्भाव होता है। भले ही कोई शैक्षणिक डिग्री मिले या न मिले, लेकिन विनयशील बनना जीवन की सबसे बड़ी आध्यात्मिक उपलब्धि है।
२. बल, बुद्धि और यश की वृद्धि : आगम और शास्त्रों में कहा गया है कि जो अभिवादनशील और विनययुक्त होता है, उसके आयुष, बल, बुद्धि और यश में निरंतर वृद्धि होती है।
३. दुर्गति से बचाव और सुकुल की प्राप्ति : विनयप्रतिपन्न (विनयशील) व्यक्ति कभी किसी की अवज्ञा या आशातना नहीं करता। ऐसा साधक नरक गति, तिर्यंच गति तथा देव व मनुष्य की दुर्गति में जाने से स्वयं को रोक लेता है। आगामी जन्म में भी उसे उत्तम कुल (सुकुल)
की प्राप्ति होती है और वह समाज में अत्यंत लोकप्रिय बनता है।