प्राण रहे या जाए... देव, गुरु और धर्म पर आस्था कभी न डगमगाए : आचार्यश्री महाश्रमण

गुरुवाणी/ केन्द्र

लाडनूं। 09 अगस्त, 2026

प्राण रहे या जाए... देव, गुरु और धर्म पर आस्था कभी न डगमगाए : आचार्यश्री महाश्रमण

जैन श्वेतांबर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, नेमानंदन, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमण जी ने मुख्य प्रवचन में ‘धर्म श्रद्धा से क्या मिलेगा?’ विषय पर उत्तरज्झयणाणि आगम के आधार पर चतुर्विध धर्मसंघ को पावन देशना प्रदान की।
'धर्म श्रद्धा से क्या मिलेगा?': सात सौख्यों से विरक्ति और अव्याबाध सुख–
१. भौतिक vs आध्यात्मिक सुख : पूज्य प्रवर ने फरमाया कि 'सात' (साता वेदनीय कर्म) के उदय से मिलने वाले भौतिक सुख क्षणिक और अनुकूलता मात्र हैं। इसके विपरीत, कर्मों के कटने और आत्मा की निर्मलता से प्राप्त होने वाला 'आध्यात्मिक सुख' अत्यंत उच्च कोटि का होता है।
२. अगार से अणगार की यात्रा : धर्म-श्रद्धावान व्यक्ति सात वेदनीय जनित भौतिक सुखों से विरक्त हो जाता है। ऐसा जीव अगार (गार्हस्थ्य) जीवन का परित्याग कर अणगार (साधु) धर्म स्वीकार कर लेता है और संयम मार्ग पर अग्रसर होता है।
३.अव्याबाध सुख की प्राप्ति: धर्म-श्रद्धा का प्रगाढ़ चिंतन साधक को संसार के समस्त दुःखों से मुक्त कर देता है, जिससे वह अंततः मोक्ष के अक्षय और अव्याबाध परम सुख को प्राप्त कर लेता है।
प्रातःकालीन दिनचर्या और गृहस्थ धर्म का पावन संदेश–
१. प्रातःकालीन साधना का नियम: पूज्यश्री ने दैनिक जीवन के लिए महत्वपूर्ण प्रेरणा देते हुए कहा कि सुबह सामायिक की साधना बहुत उत्तम है। जहाँ तक संभव हो, प्रातः नाश्ता करने या मुख में पानी लेने से पहले कम से कम एक माला नवकार जप अवश्य पूर्ण हो जानी चाहिए।
सामायिक की विधि: सामायिक के दौरान स्वाध्याय, जप और चौबीसी
व गीतिकाओं का संगान किया जा
सकता है।
इस दौरान मन, वचन और काया की अशुभ योग वाली प्रवृत्तियों पर पूर्ण विराम रहना चाहिए।
२. देव, गुरु व धर्म पर अडिग आस्था : गृहस्थों के लिए संदेश देते हुए आचार्यश्री ने कहा कि—'अर्हत् मेरे देव हैं, शुद्ध साधु मेरे गुरु हैं और जिनवाणी मेरा सिद्धांत है।' कैसी भी विपरीत परिस्थिति आए, अहिंसा, सत्य और ईमानदारी के प्रति श्रद्धा कभी डगमगानी नहीं चाहिए
चारित्रात्माओं को सम्बोधन–
अंतिम श्वास तक संयम निष्ठा: पूज्यश्री ने साधु-साध्वियों को सम्बोधित करते हुए कहा कि अंतिम श्वास तक साधुपना अक्षुण्ण रहे और सम्यक् दर्शन स्थायी बना रहे।
संघ जीवन में आने वाले उतार-चढ़ाव में भी संयम और साधना के प्रति निष्ठा बनी रहनी चाहिए।