गुरुवाणी/ केन्द्र
दायित्व निभाएं पर मोह से बचें... अनासक्ति ही आत्मा का सच्चा कवच : आचार्यश्री महाश्रमण
जैन श्वेतांबर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, तीर्थंकर के प्रतिनिधि, युगप्रधान आचार्य श्री महाश्रमण जी ने मुख्य प्रवचन में ‘निर्वेद से क्या मिलेगा?’ विषय पर उत्तरज्झयणाणि आगम के माध्यम से चतुर्विध धर्मसंघ को पावन देशना प्रदान की।
'निर्वेद से क्या मिलेगा?': सम्यक्त्व का तीसरा लक्षण और वैराग्य–
१. निर्वेद का अर्थ : सम्यक्त्व के लक्षणों में शम और संवेग के बाद तीसरा लक्षण निर्वेद (वैराग्य या विरक्ति का भाव) है।
वैराग्य के तीन प्रकार:
२. भव वैराग्य : संसार चक्र और जन्म-मरण के परिभ्रमण से विरक्ति।
३.शरीर वैराग्य: शरीर का उपयोग साधना के लिए करना, पर उसके प्रति ममत्व या बाह्य सजावट-आकर्षण से परे रहना।
भोग वैराग्य: पांचों इंद्रियों के विषयों (शब्द, रूप, गंध, रस, स्पर्श) और काम-भोगों के प्रति आसक्ति का अभाव।
अशौच अनुप्रेक्षा और गृहस्थ जीवन में अनासक्ति:
१. शरीर की अशुचिता: पूज्य प्रवर ने १२ भावनाओं में वर्णित 'अशौच अनुप्रेक्षा' का उल्लेख करते हुए बताया कि जिस शरीर के प्रति तीव्र मोहासक्ति होती है, वह भीतर से कितना अशुचि (अपवित्र) है।
२.गृहस्थ के लिए संदेश: व्यक्ति परिवार में रहकर अपने दायित्वों का पालन अवश्य करे, लेकिन निश्चय नय से यह चिंतन रखे कि 'यह परिवार भी मेरा नहीं है'। पदार्थों और व्यक्तियों के प्रति आसक्ति से बचना ही सच्चा निर्वेद है।
आरंभ-समारंभ का त्याग और सिद्धि मार्ग:
१. अहिंसा व संयम : विरक्त व्यक्ति अनावश्यक आरंभ-समारंभ और ऐसी प्रवृत्तियों से दूर रहता है जिससे किसी प्राणी को कष्ट पहुँचे।
२. सिद्धि मार्ग का वरण : निर्वेद को प्राप्त साधक संसार मार्ग का विच्छेद कर मोक्ष (सिद्धि) मार्ग पर अग्रसर हो जाता है।
३. पावन प्रेरणा : पूज्यश्री ने साधना, स्वाध्याय, सेवा और खान-पान में संयम रखते हुए निर्वेद भाव को पुष्ट करने की प्रेरणा दी।