धन छूटे तो छूटे, धर्म पर न आए आंच! : आचार्यश्री महाश्रमण

गुरुवाणी/ केन्द्र

लाडनूं। 05 अगस्त, 2026

धन छूटे तो छूटे, धर्म पर न आए आंच! : आचार्यश्री महाश्रमण

जैन श्वेतांबर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमण जी ने मुख्य प्रवचन में ‘सम्यक् दर्शन रहे सुरक्षित’ विषय पर उत्तराध्ययन आगम के माध्यम से चतुर्विध धर्मसंघ को पावन देशना प्रदान की।
'सम्यक् दर्शन रहे सुरक्षित': आगम के आलोक में पावन देशना :
१.​ निश्चय सम्यक्त्व : चार अनंतानुबंधी कषाय और दर्शन मोह त्रिक—इन ७ प्रकृतियों के क्षय, उपशम या क्षयोपशम होने पर आत्मा में पूर्ण सम्यक्त्व प्रकट होता है। किसी भी संप्रदाय या वेश-परिवेश का व्यक्ति हो, सम्यक्त्व आते ही उसका एक निश्चित समय में मोक्ष जाना तय हो जाता है।
२.​ व्यवहार सम्यक्त्व : यथार्थ के प्रति श्रद्धा, संघ व संघपति के प्रति निष्ठा ही व्यवहार सम्यक्त्व है। 'अर्हत् मेरे देव, शुद्ध साधु मेरे गुरु और जिन-प्रज्ञप्त मेरा धर्म है'—यह निर्विवाद परिभाषा सर्वसम्मत है।
सम्यक् दर्शन को सुरक्षित रखने के ८ अंग :
१. ​निःशंकित (निर्भीकता): देव, गुरु व धर्म पर अवांछनीय शंका न करें। किसी भय या नुकसान के डर से धर्म की आस्था न छोड़ें। धन भले चला जाए, प्राण भले चले जाएं, पर धर्म न छूटे।
२.​ निकांक्षित : अन्य भौतिक चकाचौंध या कुमतों के प्रति आकर्षण न हो और न ही सांसारिक सुखों की आकांक्षा के लिए धर्म साधना करें।
३.​ निर्विचिकित्सा : धर्म के फल में संदेह न करें और मल-मूत्र आदि से घृणा न रखें।
४.​ अमूढ़ दृष्टि : मोहयुक्त दृष्टि न हो; राग-द्वेष युक्त देवजातियों के प्रति धार्मिक दृष्टि से आस्था न रखें।
५. ​उपगूहन : मृदुता, क्षमा, निष्छलता आदि गुणों को पुष्ट करना।
६.​ स्थिरीकरण : संयम धर्म में अस्थिर होते साधर्मिक को पुनः धर्म में स्थिर करने का प्रयास करना।
७.​ वात्सल्य : अहिंसा, धर्म और साधर्मिकों (साधु-साध्वियों) के प्रति निःस्वार्थ प्रेम और सेवा-सहयोग का भाव रखना।
८.​ प्रभावना : उत्तम व्याख्यान, तत्व-निरूपण, संयम और तपस्या के द्वारा धर्म की प्रभावना करना।
​वरिष्ठ साध्वी श्री राजीमती जी के ९४वें जन्मदिवस पर अभिवंदन:
१.​आचार्यश्री का मंगल आशीर्वाद: बहुश्रुत परिषद् की सदस्या साध्वी श्री राजीमती जी के ९३ वर्ष पूर्ण कर ९४वें वर्ष में प्रवेश पर पूज्य प्रवर ने फरमाया कि—'यह एक बड़ी उपलब्धि है। आपका संयम पर्याय लंबा रहे, स्वास्थ्य का ध्यान रखें और धर्म की प्रभावना होती रहे।'
२.​ युवाचार्यश्री का उद्बोधन: युवाचार्य श्री महावीर कुमार जी ने कहा कि—'साध्वी राजीमती जी धर्मसंघ की विशिष्ट साध्वी हैं। आत्मा के प्रति निश्चय व व्यवहार का उनका जीवन क्रम सबके लिए प्रेरणादायी है।'
३.​ साध्वी प्रमुखा श्री व साध्वी वर्याजी के विचार: ​साध्वी प्रमुखा श्री विश्रुत विभा जी ने साध्वी जी की संघ-भक्ति और जन-सेवा की सराहना की।
​साध्वी वर्या संबुद्ध यशा जी ने उनके सादगीपूर्ण और जागरूक संयम जीवन का उल्लेख किया।
श्रावक-श्राविकाओं व चारित्रात्माओं की अभिव्यक्ति: साध्वी कनक श्री जी, साध्वी कल्पलता जी, मुनि दिनेश कुमार जी, समणी नियोजिका मधुर प्रज्ञा जी तथा स्वयं साध्वी राजीमती जी ने पूज्य प्रवर के प्रति कृतज्ञता व्यक्त की।