गुरुवाणी/ केन्द्र
चारित्र वह ढाल, जो काट दे कर्मों का जाल : आचार्यश्री महाश्रमण
जैन श्वेतांबर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, अहिंसा यात्रा प्रणेता, अखंड परिव्राजक, महातपस्वी आचार्यश्री महाश्रमण जी ने मुख्य प्रवचन में ‘क्या है चारित्र’ विषय पर उत्तरज्झयणाणि आगम के माध्यम से चतुर्विध धर्मसंघ को पावन देशना प्रदान की।
'क्या है चारित्र?': समता भाव और कर्म निर्जरा का मार्ग
१.चारित्र की मूल परिभाषा: मोक्ष मार्ग के चार अंगों में एक प्रमुख अंग 'चारित्र' है। समता भाव ही चारित्र है। महाव्रत, समितियां और गुप्तियां—इन सबका प्राण तत्व समभाव ही है। समभाव रहने पर अशुभ योग का अभाव होता है, और यही चारित्र है।
२. कर्म संचय को रिक्त करने का माध्यम : चारित्र नए कर्मों के आस्रव को रोकता है और शुभ योग से पूर्व संचित कर्मों की निर्जरा करता है। चारित्र के अंतर्गत ही 'तप' का समावेश होता है।
२५ बोल के आधार पर 'पांच चारित्र' का आगमिक विश्लेषण
१. सामायिक चारित्र : सर्व सावद्य योग (पाप व्यापार) का तीन करण, तीन योग से त्याग सामायिक चारित्र है। यह इत्वरिक (अल्पकालिक—७ दिन, ४ माह या ६ माह) एवं यावत्कथित (जीवनभर) दो प्रकार का होता है।
२. छेदोपस्थापनीय चारित्र : वर्तमान में भगवान महावीर की परंपरा में यह व्यवस्था है। मूल दीक्षा के प्रायः ७ दिनों बाद छेद (विभाग)पूर्वक त्याग करवाकर जो 'बड़ी दीक्षा' दी जाती है, वही छेदोपस्थापनीय चारित्र है।
३. परिहार विशुद्धि चारित्र : यह विशेष तपस्यात्मक साधना है, जिसमें ९ साधु मिलकर (४ तपस्वी, ४ सेवाभावी और १ वाचनाचार्य) ६-६ महीने के क्रम से कुल १८ महीने में साधना संपन्न करते हैं।
४. सूक्ष्म संपराय चारित्र : ९वें गुणस्थान में क्रोध, मान, माया के उपशांत या क्षीण होने पर भी १०वें गुणस्थान में सूक्ष्म लोभ शेष रहता है। यह १०वें गुणस्थान का चारित्र है।
५. यथाख्यात चारित्र : यह ११वें से १४वें गुणस्थान तक (छद्मस्थ एवं केवली दोनों अवस्थाओं में) होता है, जहाँ पूर्ण वीतरागता प्रकट होती है।
मन-वचन-काया की साधना और प्रेक्षाध्यान :
१. गुप्ति व तेरह नियम : साधु अपनी वचन गुप्ति, काय गुप्ति और मन की चंचलता को नियंत्रित कर चारित्र को निर्मल बनाए रखे। साधु के १३ नियमों के प्रति सजगता ही चारित्र का कवच है।
२. प्रेक्षाध्यान का संदेश : प्रेक्षाध्यान के माध्यम से मन की चंचलता को नियंत्रित किया जा सकता है। यदि क्रियाएं भावपूर्ण हों तो चलते, बोलते और सोते समय भी ध्यान की स्थिति निष्पन्न हो सकती है।