'सम्यक्त्व के बिना ज्ञान अज्ञान है, चारित्र के बिना मोक्ष असंभव':आचार्यश्री महाश्रमण

गुरुवाणी/ केन्द्र

लाडनूं। 04 अगस्त, 2026

'सम्यक्त्व के बिना ज्ञान अज्ञान है, चारित्र के बिना मोक्ष असंभव':आचार्यश्री महाश्रमण

जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के वर्तमान अधिशास्ता, अखंड परिव्राजक, महातपस्वी आचार्यश्री महाश्रमण जी ने प्रातःकालीन मुख्य प्रवचन में ‘बिना मोक्ष के निर्वाण कहां’ विषय पर आगम के माध्यम से चतुर्विध धर्मसंघ को अमृत देशना प्रदान की।
मोक्ष और निर्वाण की श्रृंखला (कार्य-कारण संबंध)–
१. निर्वाण किसे? जिसकी सकल कर्मों से मुक्ति (मोक्ष) हो जाती है, उसी को निर्वाण प्राप्त होता है।
२. मोक्ष किसे? जिसमें चारित्र गुण होता है, उसी का मोक्ष संभव है।
३. चारित्र किसे? जिसमें सम्यक् ज्ञान होता है, उसी में चरण/चारित्र गुण प्रकट होता है।
४. सम्यक् ज्ञान किसे? जो सम्यक् दर्शन (सम्यक् श्रद्धा) वाला होता है, उसी में सम्यक् ज्ञान होता है।
सम्यक्त्व के अभाव में स्थिति :
१. जो सम्यक् दर्शन से हीन है, उसमें सम्यक् ज्ञान नहीं हो सकता।
२. बिना सम्यक् ज्ञान के चारित्र गुण नहीं आ सकता, बिना चारित्र के मोक्ष नहीं हो सकता और बिना मोक्ष के निर्वाण प्राप्त नहीं हो सकता।
'दर्शन' शब्द के ६ अर्थ :
१. शास्त्र में 'दर्शन' के कई अर्थ बताए गए हैं–
१. देखना, २. नेत्र
३. सामान्य अवबोध, ४. दिखाना,
५. सिद्धांत और ६. श्रद्धा/आस्था।
२. यहाँ 'दर्शन' शब्द का प्रयोग 'श्रद्धा और आस्था' के संदर्भ में हुआ है।
सम्यक् दर्शन (कारण) और सम्यक् ज्ञान (कार्य) :
१. ज्ञान तो मिथ्यात्वी के पास भी हो सकता है, परंतु सम्यक्त्व के बिना वह 'अज्ञान' कहलाता है।
२. जैसे ही सम्यक्त्व आ जाता है, वही अज्ञान 'सम्यक् ज्ञान' में परिवर्तित हो जाता है।
चारित्र प्राप्ति के दो माध्यम (मरुदेवा माता का दृष्टांत) :
चारित्र दो प्रकार से आ सकता है–
१. विधिवत् प्रत्याख्यान/दीक्षा द्वारा।
२. चेतना की ऐसी परम विशुद्धि और मोहनीय कर्म के विलय से, जहाँ भावों ही भावों में बिना बाह्य चारित्र ग्रहण किए भी केवलज्ञान/मोक्ष की स्थिति बन जाती है (जैसे मरुदेवा माता)।
दीक्षा की प्रक्रिया:
आचार्य प्रवर ने फरमाया कि दीक्षा सामान्यतः 'सामायिक चारित्र' से शुरू होती है । इसके पश्चात, निर्धारित कालावधि और पात्रता के आधार पर 'छेदोपस्थापनीय चारित्र' प्रदान किया जाता है।
अनिवार्यता नहीं : पूज्य प्रवर ने बताया कि 'छेदोपस्थापनीय चारित्र' मिलना अनिवार्य नहीं है, क्योंकि किसी विशेष परिस्थिति (जैसे वृद्ध साधक या संथारा) में केवल सामायिक चारित्र में भी जीवन का अवसान हो सकता है
गुरु और दीक्षा : 24 तीर्थंकरों के शासन में पहली बार दीक्षा लेने
की व्यवस्था एक समान ही रहती है,
जहाँ सामायिक चारित्र ही प्रथम सोपान होता है।