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अलौकिक बालक महावीर के उत्कर्ष जीवन पोथी की कहानी
1. युवाचार्य पद मनोनयन की ऐतिहासिक घोषणा
१. पावन प्रसंग व उपस्थिति : लाडनूं की पावन धरा पर, जैन विश्व भारती के पवित्र विशाल प्रांगण में आयोजित योगक्षेम के पावन अवसर पर, भिक्षु त्रिशताब्दी समापन के प्रसंग पर सैकड़ों-सैकड़ों साधु-साध्वियों और हजारों-हजारों श्रावक समाज की समुपस्थिति।
२.घोषणा की तिथि : युग प्रधान संघ शिरोमणि आ. श्री महाश्रमणजी ने ता. 27-7-2026 (वि.सं. आषाढ़ शुक्ला त्रयोदशी) को यह घोषणा की।
३. ऐतिहासिक निर्णय : तेरापंथ के आईने में एक स्वर्णिम इतिहास का अध्याय जोड़ते हुए, आचार्य-युवाचार्य की गरिमामय, गौरवशाली, स्वस्थ, शालीन व प्रभावी परम्परा को सुरक्षित रखते हुए तथा धर्मशासन में नया कीर्तिमान स्थापित करने हेतु मुनि महावीरकुमारजी (मुख्य मुनिप्रवर) को अपने उत्तराधिकारी पद की घोषणा करते हुए युवाचार्य पद पर मनोनीत कर तेरापंथ धर्मसंघ को निश्चिन्त व भाग्यशाली बना दिया!
४. उल्लास व जयघोष : दूरद्रष्टा आचार्य महाश्रमण ने पारगामी सोच से तराशे हुए उत्तराधिकारी का चयन कर जब सुशोभित किया, उस समय सुधर्मा सभा समवसरण शंखनाद व जयनारों के बुलन्दी घोषों से सम्पूर्ण धरा गूंज उठी। ऐसा लग रहा था देवगण भी अपनी खुशी अभिव्यक्त कर रहे हों!
५. इतिहास का पुनरावर्तन : जिस प्रकार आचार्य तुलसी ने मुनि नथमलजी (महाप्रज्ञजी) को युवाचार्य पद और आचार्यश्री महाप्रज्ञजी ने मुनि महाश्रमण को युवाचार्य पद पर अलंकृत किया था, उसी इतिहास का पुनरावर्तन करते हुए आचार्यश्री महाश्रमण ने मुनि महावीरकुमार (मुख्यमुनि) को युवाचार्य पद पर परिस्थापित कर तेरापंथ धर्मसंघ को चिरंजीवी व धन्य बना दिया। युवाचार्यश्री के भाग्य का अभ्युदय होते ही तेरापंथ धर्मसंघ का भाग्योदय हो गया।
2. आचार्यप्रवर के प्रति कृतज्ञता एवं मंगल भावनाएँ :
१.अभिवंदना : मैं आचार्यप्रवर के अलौकिक, विलक्षण चिंतन, विलक्षण निर्भय निर्णायक शक्ति और विलक्षण उत्तराधिकारी के मनोनयन की इस धमाकेदार घोषणा की अभिवंदना करती हूँ; यह संपूर्ण भविष्य का अमल-धवल शुभ दस्तावेज है।
२. आनंद का माहौल : संपूर्ण संघ दिव्य ज्योतिर्धर कालजयी व्यक्तित्व के प्रति वंदना-अभिवंदना करता हुआ खुशियों की सौगात पाकर प्रमुदित, पुलकित व प्रफुल्लित है।
३. शुभकामना : हर्षोल्लास के इन अनमोल क्षणों में यही मंगल कामना करते हैं कि यह उर्ध्वारोहण की अलौकिक यात्रा गुरु दृष्टि का आराधन करती हुई साधना पथ पर निरन्तर गतिमान बनी रहे।
3.मुनि महावीरकुमारजी का गुरु-सेवा काल व विभिन्न पद
१. सेवा साधना : अनन्त-अनन्त आस्था के धाम आचार्यश्री महाश्रमणजी ने मुनि महावीरकुमार पर कृपा प्रसाद बरसाते हुए अनेक नये पदों से नवाजा है। वर्षों तक मुनि महावीर आचार्य श्री महाप्रज्ञजी की लगननिष्ठा, सेवाभाव, निष्ठाभाव व विनयभाव से तेल-मर्दन सेवा में संलग्न रहे।
२. विकास यात्रा : तेरापंथ धर्मसंघ में आचार्य महाप्रज्ञ व युवाचार्य महाश्रमण के श्रीचरणों में मुनि महावीरकुमार के विकास की जो यात्रा चली, वह अपने आपमें विलक्षण व अलौकिक है। दीक्षा लेते ही मुनि महावीर को आचार्यश्री ने युवाचार्य महाश्रमणजी को सौंपा। आचार्य श्री महाश्रमणजी ने कसौटियों पर कसते हुए परीक्षाएं भी लीं।
३. प्राप्त दायित्व व उपलब्धियाँ:
2010: आचार्य श्री महाश्रमणजी के पत्र व संवाद सेवा में नियुक्ति।
2010: आचार्य श्री महाश्रमण द्वारा समुच्चय शयन नियुक्ति।
2011: गीत गायन प्रतियोगिता में प्रथम स्थान प्राप्त किया। मुख्यमुनि महावीरकुमारजी के विशेष कार्यों और योग्यता से प्रसन्नमना आचार्य श्री महाश्रमण ने इनके लिए 'महावीर अष्टकम्' का निर्माण कर मंगल आशीर्वाद प्रदान किया।
2012 (26-12-12) : समीक्षा परिषद के सदस्य बनाये गये। केन्द्र में कल्याण परिषद, शताब्दी संगोष्ठी आदि सभी बैठकों में उपस्थित रहने का आदेश मिला।
2015: नव दीक्षित व बाल मुनियों के लिए संस्कार निर्माण का प्रभार सौंपा गया।
४. शैक्षणिक श्रेष्ठता : दीक्षा के पश्चात सप्तवर्षीय पाठ्यक्रम में प्रथम स्थान प्राप्त करने पर 'श्रेष्ठ श्रुताराधक' के अलंकरण से विभूषित किया गया और साथ ही यूनिवर्सिटी में बी.ए. में टॉपर बन गोल्ड मेडल प्राप्त किया। इसके पश्चात् जैन विश्व भारती से एम.ए. का कोर्स सम्पन्न किया।
4.मुख्यमुनि पद पर प्रतिष्ठा एवं शिल्पी गुरु
१. गुणों की खान: मुनि महावीरकुमार ने निश्चलता, सरलता, विनम्रता, सेवाभावना, संघनिष्ठा, आज्ञानिष्ठा, गुरुनिष्ठा, आगमनिष्ठा, आचारनिष्ठा, अलौकिक समर्पणभाव, विलक्षण प्रतिभा, पुरुषार्थी श्रमशीलता आदि गुणों से आचार्य श्री महाश्रमणजी के दिल को जीतकर हृदय में स्थान जमाया।
२. मुख्यमुनि पद (2016) : अर्हताओं का मूल्यांकन करते हुए आचार्य महाश्रमण ने बरपथार गांव (आसाम) की धरा पर वि.सं. 2073 ज्येष्ठ कृष्णा चतुर्दशी (ता. 4-6-2016) को शिष्य मुनि महावीरकुमार को 'मुख्यमुनि' पद पर प्रतिष्ठित कर संघ के भविष्य का द्वार खोल दिया।
३. गुरुदेव के शब्द : उस समय आपश्री ने दो पदों का सृजन कर फरमाया— 'मैं अपने में 100% कर्ज महसूस करता था, तो मैं सोचता हूं कि मुनि महावीर को मुख्यमुनि और साध्वी सम्बुद्धयशा को 'साध्वीवर्या' पद पर पदासीन करके मैं 100% प्रतिशत तो अभी अपने को हल्का नहीं मानता हूं पर अगर भूल न करूं तो मैंने मेरा 90% प्रतिशत काम किया है। 90% हल्का हो गया हूं।'
४. शिल्पी गुरु : आ. महाश्रमणजी ने शिल्पीकार बन अनगढ़ पत्थर को मूर्ति का आकार दे शिव-शंकर बना दिया, हीरे को कोहिनूर बना दिया। गुरु महान-महानत्तम परोपकारी होते हैं; जिस पर गुरु की नजर पड़ जाती है, वह धन्य व निहाल हो जाता है। युवाचार्य महावीरकुमारजी गुणों के समवाय हैं; आपश्री के जीवन-पोथी का हर पन्ना उत्कर्ष से भरा हुआ है। गुरु के प्रति अटूट श्रद्धा, आस्था, भक्तिभाव व विनयभाव से गुरु का विश्वास प्राप्त किया है; आचार्य श्री ने भी समय-समय पर मुनि महावीरकुमार का खूब मान-सम्मान बढ़ाया है।
5.साध्वीश्री की अनुभूति और बालक महावीर का बचपन
१.साध्वीश्री की प्रसन्नता: मुझे अत्यंत गौरव की अनुभूति हो रही है; अति उल्लास व प्रसन्नता से आनन्दित-आल्हादित हो उठी हूँ। हृदय-सागर में आनन्द का पारावार लहरा रहा है, सीना गौरव से गौरवान्वित हो रहा है, मन मयूर नाच रहा है। जिस बालक महावीर को दीक्षा के लिए तैयार किया, दीक्षा दिलाने तक पूरी पृष्ठभूमि बना भूमिका निभाई, वह आज धर्मसंघ के भाल पर चमक-दमक रहा है। कण-कण में अपूर्व हर्षोल्लास है।
२.बालक के नैसर्गिक गुण: बालक महावीर को बचपन से ही मैंने जाना, पहचाना व परखा है। ये प्रतिभा सम्पन्न, मेधावी, तीक्ष्ण बुद्धि के धनी थे। सहज सरलता, विनम्रता, नम्रता, संगीतप्रियता आदि इनके नैसर्गिक गुण थे।
6. प्रथम मिलन एवं वैराग्य के संस्कारों का बीजारोपण
१. प्रथम मिलन (सन 1999): मैं सन 1999 का बायतू चातुर्मास परिसम्पन्न कर चौखले का परिभ्रमण करते हुए फलसुंड गई। स्वरूपचन्दजी सवाईचन्दजी कोचर के निवास स्थान (महावीर मुनि का निवास स्थान) दुकान में रहना हुआ; शैयातर का लाभ मिला। महावीर लगभग 9-10 वर्ष का बच्चा था पर संस्कारी था, अच्छी सेवा करता था
२. वैराग्य का अंकुरण : मैंने बालक महावीर पर ध्यान केन्द्रित किया; भक्तामर, पच्चीसबोल आदि कण्ठस्थ भी कराए। दो महीने के प्रवास काल में बालक महावीर के दिल में वैराग्य का बीज प्रस्फुटित हुआ। त्याग, प्रत्याख्यान व तपस्या का अच्छा माहौल बना; जैन व अजैन समाज में धर्मसंघ की अच्छी प्रभावना हुई।
३. द्वितीय प्रवास (सन 2000) : आ. महाप्रज्ञ द्वारा घोषित सन 2000 का चातुर्मास बाड़मेर शहर में सम्पन्न कर चौखले की ओर विहार किया। चौखले के क्षेत्रों में धर्म जागरण करते हुए फिर फलसुंड जाना हुआ; इस बार जेठमलजी कोचर को शैयातर का लाभ मिला।
४. कठिन साधना : मेरा तो एक ही लक्ष्य था—बालक महावीर के वैराग्यभाव को सिंचन कर परिपुष्ट करना। एक छोटे से कमरे में रहना हुआ, जहाँ चार साध्वियां भी कठिनाई से सो पाती थीं। आने वालों को आश्चर्य होता कि इतने छोटे से कमरे में साध्वीश्री कैसे रहते होंगे; पर गुरु कृपा से प्रसन्नमन रहते। तीनों टाइम प्रवचन होता, पता ही नहीं चलता कैसे समय बीत जाता।
५. होनहार बालक की पहचान : बालक महावीर में छिपी अर्हता को मैंने जाना-पहचाना। कई बार परिवार (पिताजी सवाईचन्दजी आदि) को समझाते हुए मैं कहती—
होनहार महावीर है, विनय विवेक प्रवीण
कुल का नाम रोशन करेगा, वैराग्यभाव में लीन॥
६. संस्कार व लक्ष्य : बचपन से महावीर स्थिरयोगी, स्थितप्रज्ञ था। यह अपने नाम को सार्थक करेगा, ऐसा लगता है महावीर ही बनेगा; मेधावी, तीक्ष्ण बुद्धि सम्पन्न, विनय-विवेकी, समझदार व सुसंस्कारी बालक है। मुझे तो ऐसा भी लगता है कि विशिष्ट बनेगा, होनहार है। महावीर को मैं 'वैरागी मुमुक्षु' नाम से ही पुकारती थी। जनता में भी यही चर्चा चलती कि साध्वीजी महावीर को तैयार करने ही आये हैं। सिंवाची-मालाणी से भी लोग आते रहते, उन्हें मैं कहती—यह वैरागी है, दीक्षा लेगा।
७. संघीय संस्कार : मेरा एक ही लक्ष्य था—इस एरिया के बालक महावीर को तैयार कर दीक्षा दिलाना। मां, सवाईचन्दजी, बड़े पापा स्वरूपचन्दजी को भी आज्ञा के लिए समझाती रहती। महावीर को संघीय संस्कार देने, सिखाने व वैराग्यभाव को पुष्ट करने हेतु लक्ष्यपूर्वक पीछे लगी रहती। जनता में दान, शील, तप, श्रद्धा व आस्था की अत्यधिक अभिवृद्धि हुई। तीन महीने रहना हुआ; मर्यादा महोत्सव हुआ और सभी ने अच्छा लाभ उठाया।
7.गंगाशहर मर्यादा महोत्सव एवं ऐतिहासिक फलसुंड चातुर्मास
१.गंगाशहर में बाल मुमुक्षु की प्रस्तुति (2001): मर्यादा महोत्सव गंगाशहर के पावन प्रसंग पर आचार्य महाप्रज्ञजी और युवाचार्य महाश्रमणजी के श्रीचरणों में 2001 के साधु-साध्वियों के चातुर्मास हेतु ससंघ फलसुंड को पूरी तैयारी के साथ गीतिका बनाकर महावीर आदि श्रावकों को तैयारी कराकर भेजा। मैंने महावीर से कहा— 'महावीर
तू मुमुक्षु है, दीक्षा के लिए तैयार है, गुरुदेव के चरणों में भावना रख लेना कि मेरा दीक्षा लेने का भाव है।' पिताजी को भी मैंने यही बात कही कि निवेदन कर देना। (शेष अगले अंक में)