गण के युवराज तुम्हारा अभिनंदन

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साध्वी पुण्ययशा

गण के युवराज तुम्हारा अभिनंदन

गण के युवराज तुम्हारा अभिनंदन
जय जय छगनी नंदन सविनय वंदन।
सतरंगी यह भोर निराली अवनि अंबर हरषाये
बाजे नंदीघोष चहुँ दिशि स्वस्तिक शुभम रचाये
महाप्रज्ञ महाश्रमण की अभिनव कृति को आज बधाएं
उतरे खरे कसौटी पर तुम सच दी दिव्य ऋचाएं
दसों दिशाएं तुम्हें बधाती नमते सुरनर जन-जन।।
गुरुद्वय की पाई तुमने कृपा दृष्टि भारी
प्रकृति भद्र सुविनीत सेवाभावी शिष्य आज्ञाकारी
योगक्षेम वर्ष में बना अप्रतिम कीर्तिमान
आभा मंडल तेज तरुणिमा पौरुष पुण्यनिधान
मंगलमय ये शुभ क्षण करते सविनय वर्धापन
नई सदी के बाल सूर्य का करता गण सम्मान
तेरापंथ के शुभ भविष्य पर है सबको अभिमान
रहो निरामय चिरं जीवतु बांटो समता का संजीवन
पग पग पर जय विजय वरो हे गण के चंदन
रहे दिवाली सदा फले फूले भिक्षु शासन नंदन वन।।