रचनाएं
शम, सम और श्रम के दिव्य त्रिवेणी संगम है : युवाचार्य श्री महावीर
भारतीय ऋषि-परम्परा में महापुरुषों का मूल्यांकन उनके पद से नहीं, अपितु उनके तप, त्याग, ज्ञान, विनय और चरित्र की ऊँचाइयों से किया जाता है। जैन श्रमण संस्कृति ने भी सदैव ऐसे ही व्यक्तित्वों को आदर्श के रूप में प्रतिष्ठित किया है, जिनके जीवन में शम, सम और श्रम का त्रिवेणी-संगम साकार हुआ हो। तेरापंथ धर्मसंघ के युवाचार्यश्री महावीर ऐसे ही तेजस्वी, तपोनिष्ठ, श्रुतसमृद्ध और विनयविभूषित व्यक्तित्व हैं। उनके व्यक्तित्व का अवलोकन करते हुए सहज ही यह अनुभूति होती है कि वे श्रमण परम्परा की उज्ज्वल साधना-धारा के सशक्त संवाहक हैं। युवाचार्यश्री महावीर सम, शम और श्रम के दिव्य त्रिवेणी-संगम हैं।' यह केवल प्रशंसात्मक अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि उनके संपूर्ण साधनामय जीवन का यथार्थ मूल्यांकन है। 'शम' जैन दर्शन में केवल मानसिक शांति का पर्याय नहीं, अपितु कषायों के उपशमन, आत्मपरिणामों की निर्मलता और चित्त की स्थिरता का द्योतक है। युवाचार्यश्री महावीर ने कठोर तप, गहन स्वाध्याय, आत्मानुशासन और निरंतर साधना के माध्यम से इस उपशमभाव को अपने व्यक्तित्व का सहज संस्कार बना लिया है। उनके मुखमंडल पर विराजमान शांति, व्यवहार में झलकती सरलता और निर्णयों में प्रतिबिंबित संतुलन इस तथ्य की साक्षी है कि साधना उनके लिए केवल उपदेश का विषय नहीं, अपितु जीवन का प्राणतत्त्व है। समता युवाचार्यश्री के व्यक्तित्व का प्राण है। जैन आगमों में समता को धर्म का सार कहा गया है। सुख-दुःख, लाभ-अलाभ, मान-अपमान तथा अनुकूलता-प्रतिकूलता जैसे द्वंद्वों के मध्य भी जो साधक आत्मस्थिति बनाए रखता है, वही वास्तविक अर्थों में समत्वयोगी होता है। युवाचार्यश्री का शांत, प्रसन्न, निर्विकार एवं सदैव सौम्य व्यक्तित्व इस समत्व साधना का प्रत्यक्ष प्रमाण है। उनकी सहज मुस्कान बाह्य विनम्रता नहीं, अपितु अंतःकरण में प्रतिष्ठित आत्मसमत्व की दिव्य अभिव्यक्ति है। श्रम युवाचार्यश्री के व्यक्तित्व का स्पंदित जीवन-सूत्र है। श्रमण परम्परा में श्रम का तात्पर्य केवल शारीरिक परिश्रम नहीं, बल्कि आत्मोत्कर्ष के लिए किया जाने वाला अखंड पुरुषार्थ है। सतत स्वाध्याय, अनुशासन, संघकार्य, आगम-अनुशीलन, चिंतन-मनन तथा साधना के प्रति उनकी अविचल निष्ठा यह सिद्ध करती है कि महानता संयोग से नहीं, बल्कि निरंतर पुरुषार्थ से अर्जित होती है। उनका जीवन इस सत्य का सजीव प्रमाण है कि साधना का प्रत्येक शिखर श्रम की सीढ़ियों से ही प्राप्त होता है। युवाचार्यश्री के व्यक्तित्व में शील और श्रुत का मणिकांचन-संयोग विलक्षण रूप से विद्यमान है। वे जितने गंभीर श्रुताराधक हैं, उतने ही उत्कृष्ट साधक भी हैं। आगमिक अध्ययन की गहनता, तत्त्वचिंतन की प्रखरता, व्याख्यान की तार्किकता तथा अभिव्यक्ति की ओजस्विता उन्हें समकालीन श्रमण परम्परा में विशिष्ट पहचान प्रदान करती है। उनकी विद्वत्ता में अहंकार का लेश नहीं, अपितु विनय की सौम्यता और आत्मीयता का मधुर स्पर्श है। इसी कारण उनका ज्ञान केवल बुद्धि को नहीं, हृदय को भी आलोकित करता है। युवाचार्यश्री की वाणी में शास्त्र का प्रमाण, अनुभव की प्रामाणिकता और साधना की ऊष्मा का अद्भुत समन्वय है। उनके प्रवचन केवल वैचारिक विमर्श नहीं, बल्कि आत्मजागरण का मंगल आह्वान हैं। वे श्रोताओं को धर्म का बौद्धिक परिचय भर नहीं देते, बल्कि धर्म को जीवन में उतारने की प्रेरणा प्रदान करते हैं। उनकी प्रत्येक वाणी आत्मशोधन, संयम, करुणा, अनेकांत और मानवीय मूल्यों की प्रतिष्ठा का संदेश देती है। युवाचार्यश्री की विनय, समर्पण और गुरु-निष्ठा उन्हें विशिष्ट बनाती है। जैन परम्परा में कहा गया है—'विणओ सासणे मूलं' अर्थात् विनय ही शासन का मूलाधार है। युवाचार्यश्री ने इस सिद्धांत को केवल स्वीकार नहीं किया, बल्कि अपने जीवन में पूर्णतः चरितार्थ किया है। युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी के प्रति उनकी अनन्य श्रद्धा, निष्कपट समर्पण और आज्ञापालन ने उन्हें गुरु-कृपा का अधिकारी बनाया है। उनका संपूर्ण जीवन इस तथ्य का प्रमाण है कि महान नेतृत्व अधिकार से नहीं, बल्कि सेवा, साधना, समर्पण और विनम्रता से अर्जित होता है। युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी द्वारा युवाचार्यश्री महावीर को युवाचार्य पद पर मनोनीत किया जाना तेरापंथ धर्मसंघ के इतिहास की एक दूरदर्शी, युगानुकूल और प्रेरणास्पद घटना है। यह निर्णय केवल उत्तराधिकार की औपचारिक घोषणा नहीं, बल्कि तप, त्याग, पात्रता, प्रज्ञा और साधनामय नेतृत्व की सार्वजनिक प्रतिष्ठा है। इससे सम्पूर्ण धर्मसंघ में नवविश्वास, नवचेतना और नवसंकल्प का संचार हुआ है। यह विश्वास दृढ़ हुआ है कि आचार्यश्री महाश्रमणजी के दिव्य मार्गदर्शन में युवाचार्यश्री महावीर धर्मसंघ की गौरवशाली परम्पराओं को अक्षुण्ण रखते हुए उन्हें नवीन युग की आवश्यकताओं के अनुरूप और अधिक प्रभावशाली स्वरूप प्रदान करेंगे। हम मंगल कामना करते हैं कि युवाचार्यश्री महावीर निरोग, निरामय, दीर्घायु एवं अखण्ड साधनामय जीवन से धर्मसंघ का ऊंचाईयां प्रदान करते रहें। उनके प्रज्ञामय चिंतन, तपोदीप्त साधना, करुणामयी दृष्टि और प्रेरणादायी व्यक्तित्व से अनंत साधक धर्म, संयम और आत्मकल्याण की दिशा में अग्रसर हों। युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी और युवाचार्यश्री महावीर की यह दिव्य गुरु-शिष्य परम्परा धर्मसंघ, राष्ट्र और समस्त मानवता के लिए चिरकाल तक मंगल, नैतिकता और आध्यात्मिक आलोक का अक्षय स्रोत बनी रहे।