रचनाएं
तुलसी जैसे संत पुरुष
वर्धापन युवराज तुम्हारा, देते आज बधाई हैं,
जन-जन के मन में छाया हर्ष, ठाण में खुशियाँ छाई हैं।
महावीर मुनि से मुख्य मुनि, मुख्य मुनि से युवराजा,
दायित्व की चादर ओढ़ाई, बने महाश्रमण गण के राजा।
दशों दिशाएँ हर्षित हैं, कण-कण में खुशियाँ छाई हैं।
सवाईमल के लाल लाडले, जबरी देवी माता हैं,
महाप्रज्ञ संयम के दाता, महाश्रमण निर्माता हैं।
विनम्रता और सहजता से, गुरु के दिल में जगह बनाई है।
अप्रमत्त स्थितियोगी हो तुम, श्रेष्ठ श्रुताराधक तुम हो,
बहुश्रुत परिषद के संयोजक, गुरु-इंगित आराधक हो।
शत-शत नमन तेरे चरणों में, जागी तेरी पुण्याई है।
आओ महावीर पुकार—गुरु ने कैसा भव्य नजारा था,
तेरापंथ के युवराज को दूर से ही निहारा था।
स्वर्णिम अवसर हमें मिला था, गुरु ने कृपा कराई है।