3 बातें ज्ञान की

स्वाध्याय

– आचार्यश्री महाश्रमण

3 बातें ज्ञान की

नमस्कार महामंत्र का दूसरा पद है—'णमो सिद्धाणं'। संसार के सारे जीवों में सिद्धों से बड़ा कोई जीव नहीं होता। वे परम आत्मा होते हैं। उन सिद्धों को नमन।
नमस्कार महामंत्र का तीसरा पद है— णमो आयरियाणं। दुनिया में आचार्यों का भी बड़ा महत्त्वपूर्ण स्थान है। वे धर्म शासन के प्रमुख होते हैं। उन आचार्यों को नमन।
नमस्कार महामंत्र का चौथा पद है— णमो उवज्झायाणं। उपाध्याय ज्ञानदाता हैं। स्वयं शास्त्रों का ज्ञान करते हैं और दूसरों को ज्ञान बांटते हैं। उन उपाध्यायों को नमन।
नमस्कार महामंत्र का पांचवां पद है—णमो लोए सव्वसाहूणं। जो साधनाशील हैं, पांच महाव्रतों का पालन करने वाले होते हैं, उन साधुओं को नमन।
इस प्रकार इतनी पवित्र आत्माओं का संकलन जिस नमस्कार महामंत्र में सन्निहित है, उस महामंत्र का स्मरण, जप, आत्म-कल्याण के लिए, आत्म-शुद्धि के लिए, भाव-शुद्धि के लिए करना चाहिए। इससे आत्म-शुद्धि का लाभ मिलता है, निर्जरा का लाभ मिलता है और संयम होता है। जब नमस्कार महामंत्र का उच्चारण करने में हम लीन रहते हैं, तब वचन की एकाग्रता होती है, मन भी उसमें लगा हुआ रहता है और साथ में शरीर की भी स्थिरता रहती है। इस प्रकार मन, वचन और काय—तीनों योगों की एकाग्रता हो जाती है।
जप करने से विघ्न-बाधाओं के निवारण में, मनोबल को बनाए रखने में और अभय रहने में भी सहयोग मिलता है। विघ्न-बाधाओं के निवारण के लिए आदमी को ज्यादा इधर-उधर नहीं जाना चाहिए। तकलीफें तो जीवन में आ सकती हैं, किन्तु हम इतने अधीर क्यों बनें? भगवती सूत्र में श्रावक के लिए कहा गया है कि श्रावक ऐसा होना चाहिए जो आपत्तिकाल में भी देवताओं के सहयोग की इच्छा न रखे। वह श्रावक की मजबूती का लक्षण है। कष्ट आए तो आए, किन्तु याचना न करना, कठिनाई में भी देवताओं की सहायता की इच्छा न रखना बहुत बड़ी बात होती है। यदि इतना मनोबल न हो तो एक सीमा तय की जा सकती है कि मैं ज्यादा सहायता की इच्छा नहीं करूंगा। कठिनाई आएगी तो निर्जरा होगी, कर्म कटेंगे—यह सोचकर कठिनाई को सहन करे। विघ्न-बाधाओं के निवारण के लिए, आपत्ति-विपत्ति से बचने के लिए, भौतिक सुविधा या लाभ पाने के लिए भी अत्यधिक किसी अन्य की शरण नहीं लेनी चाहिए; इधर-उधर भ्रमण नहीं करना चाहिए। अपने निर्धारित चार शरण ही लेना, यह भी एक साधना का सूत्र है, एक सीमाकरण है, इच्छा-परिमाण है।
नमस्कार महामंत्र को यदि परम आध्यात्मिक दृष्टि से जपा जाए तो आत्मशुद्धि के लिए लाभदायी, अगली गति के लिए लाभदायी और योगों को एकाग्र करने में लाभदायी होता है।
तीन याम
ठाणं में बताया गया है— तओ जामा पण्णत्ता, तं जहा—पढमे जामे, मज्झिमे जामे, च्छिमे जामे। (3/161)
याम तीन हैं—
1. प्रथम याम, 2. मध्यम याम, 3. पश्चिम याम।
याम शब्द के अनेक अर्थ होते हैं। आचार्य हेमचंद्र ने 'अभिधान चिंतामणि' में याम का अर्थ किया है—एक प्रहर। याम शब्द का दूसरा अर्थ मिलता है—दिन का एक तिहाई भाग और रात्रि का एक तिहाई भाग। यदि दिन को तीन भागों में विभक्त किया जाए तो सूर्योदय से ग्यारह बजे तक दिन का पहला भाग हो गया, ग्यारह बजे से तीन बजे तक दिन का दूसरा भाग हो गया और तीन बजे से सूर्यास्त तक दिन का तीसरा भाग हो गया अर्थात् सुबह, दोपहर, शाम—ये दिन के तीन भाग हो गए। इसी प्रकार रात्रि के भी तीन भाग किए जा सकते हैं—पूर्व रात्रि, मध्य रात्रि और पश्चिम रात्रि। दिन और रात्रि के ये तीन-तीन भाग याम के आधार पर किए गए।
याम का तीसरा अर्थ मिलता है— जीवन के तीन भाग। मनुष्य जीवन के तीन भाग होते हैं—प्रथम
याम, मध्यम याम और पश्चिम याम। सामान्य भाषा में बचपन, यौवन और बुढ़ापा। जीवन के ये तीनों भाग वर्षों के आधार पर व्याख्यायित किए गए हैं। जीवन के आठ वर्ष से तीस वर्ष तक की जो अवस्था है, वह जीवन का प्रथम याम है। यहाँ जो याम शब्द आया है, वह धर्म-प्रतिपत्ति के प्रसंग में आया है। तीस वर्ष से साठ वर्ष तक का जीवन मध्यम याम है और साठ वर्षों से फिर आगे का सारा जीवनकाल पश्चिम याम कहलाता है।