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तराशे तो खुदा निकले
गणाधिपति गुरुदेव आचार्य श्री तुलसी के लगभग 83 वर्ष एवं प्रज्ञा पुरुष आचार्य श्री महाप्रज्ञ के 90 वर्ष के कालखंड की समस्त भूति, विभूति और अनुभूति से युक्त हैं युगप्रधान आचार्य श्री महाश्रमण। आचार्य प्रवर ने अपनी संचित ज्ञान संपदा एवं आदर्श आचरण परंपरा को मुनि श्री महावीर कुमार जी में संक्रांत करने का मानो दृढ़ संकल्प कर लिया है। लक्ष्य यही रहा है कि अपने आश्रित को अपने तुल्य बनाना या उससे भी आगे गतिशील देखना। साधारणतया हर पिता चाहता है कि उसका पुत्र उससे आगे निकले, और हर गुरु की यही कामना होती है कि उनका शिष्य ज्ञान, दर्शन और चरित्र को पुष्ट करते हुए शीघ्र सिद्ध, बुद्ध और मुक्त बने।
गुरु की कोमलता, अनुशास्ता की कठोरता
तेरापंथ के भाग्यविधाता आचार्य श्री भिक्षु द्वारा निर्मित विधान 260–270 वर्षों के बाद भी उतना ही प्रासंगिक है। इसका 'एक गुरु और एक विधान' का नियम अद्भुत है। यह हमारी चारित्रात्माओं को आचार्य बनने की पात्रता अर्जित करने का अवसर तो देता है, किंतु पद का सपना देखने का निर्ममता से निषेध करता है। गुरु की विशेषता 'कोमलता' है, पर अनुशास्ता की भूमिका में उन्हें 'कठोर' होना पड़ता है। तेरापंथ के आचार्य को चतुर्विध धर्मसंघ का अनुशासन बनाए रखना होता है। इसीलिए कड़ाई और अप्रिय निर्णय लेना अनिवार्य हो जाता है। इस साहस के अभाव में 'पॉलिसी पैरालिसिस' आ जाता है, जो संघ के लिए दीमक का काम करता है। महामना भिक्षु ने न केवल मर्यादाओं का निर्माण किया, बल्कि उनके प्रति जनमानस में अटूट आस्था भी जगाई।
संभावनाएँ बनीं वास्तविकता
अपनी सेवा, समर्पण, विनयशीलता और कृतज्ञता के बल पर मुनिश्री महावीर कुमार जी निरंतर आगे बढ़ते गए। बचपन से ही त्याग के संस्कार और अध्यात्म के भाव पुष्ट होने लगे। वे भली-भांति संयम करना जानते हैं और अपनी आकांक्षाओं पर विराम लगाने में दक्ष हैं। आचार्य महाश्रमण जी ने उनमें प्रचुर संभावनाओं का संधान किया, जो समय के साथ वास्तविकता में बदलती चली गईं। श्रेष्ठ श्रुत आराधक, मुख्य मुनि और बहुश्रुत परिषद के संयोजक जैसे गरिमामय अलंकरणों से उनका व्यक्तित्व उद्भाषित होने लगा। वे जानते हैं कि साधना की ऊँचाई वीतरागता है, तो उसकी गहराई विनम्रता। इन दिव्य गुणों से विभूषित होकर वे संघ और संघपति की आँखों के तारे बन गए।
लोकोत्तम महावीर
आषाढ़ शुक्ल तेरस, विक्रम संवत 2083 (27 जुलाई 2026, सोमवार) को जैन विश्व भारती के पावन प्रांगण में आचार्य श्री भिक्षु के 301वें जन्म दिवस तथा 269वें बोधि दिवस के ऐतिहासिक अवसर पर आचार्य प्रवर ने मुनि श्री महावीर कुमार जी को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया। संघ की धवल चादर ओढ़ाकर उनका अभिनंदन किया गया। युवाचार्य श्री महावीर कुमार जी की आकृति और प्रकृति दोनों ही निर्मल, निश्छल और निर्भय हैं। विवेकानंद को रामकृष्ण परमहंस मिले और महाप्रज्ञ को तुलसी; वैसे ही मुनि महावीर को आचार्य महाश्रमण मिले हैं। युवाचार्य प्रवर ऋजुता में शिशु जैसे, चिंतन में प्रौढ़ और आयु से युवा हैं। शांत व सौम्य स्वभाव के युवाचार्य जी के मुख से जब वाणी बहती है, तो श्रोता मग्न हो जाते हैं। सेवा उनके जीवन का परम लक्ष्य है।
भवितव्यता
इस प्रसंग में कुछ घटनाओं का उल्लेख प्रासंगिक होगा। साध्वीप्रमुखाश्री झमकू जी महासती जी ने वरिष्ठ साध्वीश्री रूपा जी को संकेत दिया था कि मुनि महावीर धर्मसंघ के नाथ बन सकते हैं। इसी प्रकार वर्ष 2013 के लाडनूं चातुर्मास में शासनगौरव साध्वीश्री कनकश्री जी के मुख से सहज ही निकला था कि यह मुनि धर्मसंघ का उज्ज्वल नक्षत्र बनेगा। वे भविष्यवाणियाँ आज सत्य सिद्ध हो रही हैं।
निवेदन
श्रद्धेय युवाचार्यश्री को त्रैकालिक दृष्टि रखनी होगी—अतीत पर निरंतर चिंतन, वर्तमान पर ध्यान और भावी पीढ़ी के निर्माण के लिए भविष्य पर सतर्क दृष्टि। मर्यादा और अनुशासन में रहने वाला संघ ही सतत विकास कर सकता है। आपको परम धैर्य संपन्न और लचीला बनना होगा, क्योंकि— 'A moment of patience can prevent a great disaster, and a moment of impatience can ruin a whole life.'
किसी शायर ने सच ही लिखा है:
बुतों! शाबाश है तुमको, तरक्की इसको कहते हैं।
अगर न तराशे तो पत्थर थे,
तराशे तो खुदा निकले।।
अंत में— समर्थ स्रष्टा को प्रणाम...
उनकी सार्थक सृष्टि को प्रणाम...