एक दृश्य: अनेक अनुभूतियां

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साध्वी ऋद्धिप्रभा

एक दृश्य: अनेक अनुभूतियां

आषाढ़ शुक्ला त्रयोदशी को युवाचार्य मनोनयन का नयनाभिराम दृश्य देखकर मेरे मन में जिज्ञासा हुई—क्या वह दृश्य केवल उतना ही था जितना हमें खुली आँखों से दीख रहा था? स्वयं से ही जवाब मिला—नहीं, उस दृश्य के भीतर अनेक दृश्य अभिव्यक्त हो रहे थे जिसका मैंने अनुभव किया। हम सबके लिए वह क्षण 'आचार्य अपने गुरुभाई या शिष्य को उत्तराधिकारी के रूप में चुने तो सभी उसे सहर्ष स्वीकार करें'—तेरापंथ की इस मौलिक मर्यादा को जिसे हम वर्षों से सुनते आ रहे हैं, बोलते आ रहे हैं, उसे अनुभूत करने का भी महावीर-तुल्य अपूर्व अवसर था।
आचार्य प्रवर द्वारा जब अत्यंत प्रसन्नता पूर्वक 'आओ मुनि...' का आह्वान किया गया तो दर्शकों के भीतर हलचल थी, अगला दृश्य देखने की उत्सुकता थी। पर जिन्हें आह्वान किया गया था, उनके मुखारविंद पर सहजता थी। ऐसा प्रतीत हो रहा था कि भीतर में स्थिरता और समता थी। अभ्यर्थना युवाचार्य प्रवर के तटस्थ एवं संतुलित व्यक्तित्व की।
आचार्य प्रवर ने ओजस्वी वाणी में युवाचार्य पद की घोषणा की और युवाचार्यश्री को उत्तराधिकार की चादर ओढ़ाई। जब युवाचार्य प्रवर ने उस उत्तराधिकार की चादर को उत्तरदायित्व की चादर के रूप में स्वीकार किया तो ऐसा लगा मानो निरहंकारिता का साक्षात् प्रकटीकरण हुआ हो।
वर्धापना युवाचार्यश्री की निरहंकारी निस्पृह चेतना की। जब युवाचार्य प्रवर ने आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए आचार्य प्रवर के चरणों में तथा गोद में मस्तक को रखा और आचार्यप्रवर ने अपने हस्तकमलों को युवाचार्य प्रवर के मस्तक पर रखा, और अपने ही पास अपने पट्ट पर बिठाया तो ऐसा अनुभव हो रहा था मानो शक्ति-संप्रेषण की प्रक्रिया चल रही थी। उस प्रक्रिया में एक ओर से वात्सल्य के साथ शक्ति को भेजा जा रहा था तो दूसरी ओर से युवाचार्य प्रवर के द्वारा विनम्रता के साथ उसे ग्रहण किया जा रहा था।
अभिवंदना युवाचार्यप्रवर की उत्कृष्ट विनम्रता की। अभ्यर्थना उन सभी गुणों की जिन गुणों के कारण आप आचार्यप्रवर की पारखी नजरों में खरे उतरे। वर्धापना उन सभी गुणों की जिन गुणों ने आपको तेरापंथ का ताज धारण करने योग्य बनाया। भिवंदना उन सभी गुणों की जिन गुणों ने संपूर्ण धर्मसंघ को आश्वासन दिया — 'शुभ भविष्य है सामने'।