रचनाएं
अर्पित श्रद्धा का नीर
महक उठा श्रद्धा का अंबर, गूंज उठा जयघोष नया,
शासन नंदनवन सा महका, उदित हुआ विश्वास नया।
धरा धन्य है, गगन मुदित है, झूम रही हर एक दिशा,
युग ने पाया गौरव अनुपम— युवराज महावीर!
जहाँ धर्म की शीतल छाया, ज्ञान-ज्योति का दिव्य धाम,
भेदभाव के तम को हरता, प्रेम-करुणा का पावन ग्राम।
संयम-सुगंधित इस उपवन में, गूँजा गुरु का अमृत-तीर
आओ, महावीर....— युवराज महावीर!
तेज सूर्य-सा मुखमंडल, करुणा का अथाह विस्तार,
युवा चेतना की धड़कन बन, बहता अमृत का सतत प्रवाह।
शत-शत मंगल, कोटि वंदन, अर्पित श्रद्धा का नीर,
यश से आलोकित हो जग सारा— युवराज महावीर!
संकल्पों के स्वर्णिम रथ पर, बढ़ते रहें निरंतर आप,
संस्कारों की पावन धरती पर, जगमग हो हर एक प्रताप।
हिम-सी निष्ठा, सिंधु-सी गहराई, अचल रहे यह धीर,
कीर्ति-ध्वजा नभ तक लहराए— युवराज महावीर!
धर्मचक्र के दिव्य पथिक बन, अनुपम आपका प्रभाव रहे,
शौर्य, शील, अनुशासन का, जन-जन में सद्भाव रहे।
युग-युग तक यह यशगाथा, गाए सारा जग अधीर,
वंदित, पूजित, तेजस्वी— युवराज महावीर!
हम सबके प्राणों की धड़कन, शासन का अनुपम अभिमान,
तन-मन-सबकुछ अर्पित है अपना, धर्मसंघ रहे सदा बलवान।
एक संकेत पर चल पड़ेंगे, लेकर सेवा की शमशीर,
हम सब सदा आपकी सेवा में हाज़िर— युवराज महावीर!
जब-जब शासन देगा आह्वान, बढ़कर प्रथम पंक्ति में आएँगे,
त्याग, तपस्या, सेवा-पथ पर, जीवन सफल बनाएँगे।
विजय-पताका नभ तक फहरे, गूँजे शासन का हर तीर
जय-जय शासन, जय-जय गुरुवर, जय जय— युवराज महावीर!