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लोगस्स तीर्थंकर स्तुति का महान मंत्र है
डी.वी. कॉलोनी स्थित तेरापंथ भवन में आध्यात्मिकता, भक्ति और साधना का अनुपम वातावरण देखने को मिला। आचार्य श्री महाश्रमणजी के सुशिष्य मुनि दीप कुमारजी के पावन सान्निध्य में “दिव्य लोगस्स कल्प अनुष्ठान” का भव्य एवं श्रद्धामय आयोजन। इस अवसर पर मुनि दीप कुमारजी ने लोगस्स के आध्यात्मिक एवं आध्यात्मिक साधना की दृष्टि से महत्त्व पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा— “लोगस्स तीर्थंकर स्तुति का महान मंत्र है। यह एक महाशक्ति है। भक्ति-साहित्य की एक अमर, अलौकिक एवं हृदयस्पर्शी रचना है। जैन समाज में इसका अत्यंत मान्य एवं लोकप्रिय स्थान है और इसे श्रद्धा एवं महत्व प्राप्त है।” मुनि श्री ने कहा कि लोगस्स केवल तीर्थंकरों की स्तुति मात्र नहीं, बल्कि साधक को भीतर से जोड़ने वाली एक प्रभावशाली आध्यात्मिक साधना है। इसके स्वाध्याय एवं स्तवन से साधक का मन श्रद्धा, भक्ति और आत्मचिंतन की ओर उन्मुख होता है। उन्होंने कहा कि “लोगस्स शाश्वत सुख का राजपथ है। यह आरोग्य, बोधि, समाधि और सिद्धि प्रदान करने वाला है। लोगस्स में भक्ति की भागीरथी प्रवाहित होती है। साधक जब इसका पाठ करता है तो उसका हृदय भक्ति-रस से आप्लावित हुए बिना नहीं रहता।”
मुनि दीप कुमारजी ने लोगस्स की मंत्रात्मक संरचना पर प्रकाश डालते हुए कहा कि यह आगम-वर्णित एवं मंत्रगर्भित स्तवन है। इसके अक्षरों और पदों की संरचना में आध्यात्मिक दृष्टि से विशेष महत्त्व निहित है। उन्होंने कहा कि नियमित श्रद्धापूर्वक स्तवन करने से साधक के भीतर सकारात्मक ऊर्जा, श्रद्धा और आत्मबल का विकास होता है। इसकी आराधना से अनिष्ट एवं अमंगल के प्रति भय कम होता है तथा साधक के भीतर शांति, संतुलन और आत्मविश्वास की भावना पुष्ट होती है। लोगस्स का नियमित पाठ मन को एकाग्र करने और आध्यात्मिक चेतना को जागृत करने में सहायक बनता है। मुनि श्री ने लोगस्स के सात पदों की विशेषता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि सात पद अपने आप में अनेक आध्यात्मिक रहस्यों को समेटे हुए हैं। उन्होंने बताया कि किसी भी मंत्र या स्तवन की प्रभावशीलता केवल उसके उच्चारण में नहीं, बल्कि उसके प्रति श्रद्धा, भाव, एकाग्रता और नियमितता में निहित होती है।