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युवाचार्य : पद नहीं, भविष्य की दिशा का कम्पास
कल्पना कीजिए, एक विशाल जहाज समुद्र में आगे बढ़ रहा है। अनुभवी कप्तान उसके साथ है, मंजिल निश्चित है, पर बदलते मौसम और आने वाले मोड़ों को समझने के लिए एक ऐसी दृष्टि भी चाहिए जो वर्तमान से आगे देख सके।
यही युवाचार्य हैं–
युवाचार्य केवल 'भविष्य के आचार्य' नहीं होते। वे उस निरंतरता का नाम हैं, जिसमें परंपरा की जड़ें अतीत में, दृष्टि वर्तमान पर और कदम भविष्य की ओर होते हैं। तेरापंथ की गुरु-परंपरा में युवाचार्य की नियुक्ति किसी व्यक्ति को पद देना मात्र नहीं, बल्कि धर्मसंघ के भविष्य को सक्षम नेतृत्व सौंपना है। आचार्यश्री महाश्रमणजी द्वारा युवाचार्य श्री महावीरकुमारजी की नियुक्ति इसी जीवंत परंपरा की अगली कड़ी है।
युवाचार्य: GPS नहीं, Compass–
आज GPS हमें रास्ता बताता है, कहाँ मुड़ना है, कहाँ पहुँचना है। लेकिन धर्मसंघ केवल रास्ते से नहीं चलता; उसे दिशा और विवेक चाहिए। युवाचार्य वह कम्पास हैं जो बदलती परिस्थितियों में भी मूल दिशा को विस्मृत नहीं होने देते। समय बदलेगा, समाज बदलेगा, युवा पीढ़ी की भाषा और तकनीक बदलेगी; पर आचार्य भिक्षु की मर्यादा, अनुशासन और आध्यात्मिक दृष्टि अक्षुण्ण रहनी चाहिए। समय के साथ चलना, लेकिन समय के साथ बह न जाना, यही युवाचार्य की चुनौती है।
युवाचार्यः एक Bridge–
एक पुल के दो छोर होते हैं, एक परंपरा का और दूसरा भविष्य का। युवाचार्य दोनों को जोड़ने वाला सेतु हैं। एक ओर वह गुरु-परंपरा है जो आचार्य भिक्षु से आज तक चली आ रही है; दूसरी ओर वह युवा पीढ़ी है जिसके प्रश्न, भाषा और जीवनशैली बदल रही है। इसलिए युवाचार्य का दायित्व है कि परंपरा को सुरक्षित भी रखें और उसे नई पीढ़ी तक उसकी भाषा में पहुँचा भी दें।
युवाचार्य श्री महावीरकुमारजी की विशेषता इसी संदर्भ में महत्वपूर्ण हो जाती है, गंभीरता और सहजता का संतुलन, ज्ञान के प्रति सजगता, संघीय व्यवस्थाओं का अनुभव और गुरु-सन्निधि में वर्षों की साधना । बहुश्रुत परिषद से जुड़ी उनकी भूमिका और संघीय कार्यों का अनुभव इस दायित्व के लिए उनकी दीर्घ तैयारी को दर्शाता है।
युवाचार्य: Relay Race की Baton–
रिले रेस में कोई खिलाड़ी पूरी दौड़ अकेले नहीं जीतता। उसके हाथ में जो Baton आती है, वह उससे पहले किसी और के हाथ में थी और उसे आगे किसी और को सौंपना होता है। तेरापंथ की गुरु-परंपरा भी ऐसी ही यात्रा है। आचार्य भिक्षु से मिली Baton अनेक युगपुरुषों के हाथों से होती हुई आज युवाचार्य श्री महावीरकुमारजी तक पहुँची है। Baton मिलना उपलब्धि नहीं हैं; उसे बिना गिराए आगें पहुँचना उपलब्धि है। युवाचार्य का दायित्व भी यही है, परंपरा को केवल सुरक्षित रखना नहीं, बल्कि उसे आने वाली पीढ़ियों तक जीवंत रूप में पहुँचाना।
युवाचार्य शब्द में सबसे सुंदर बात है, 'युवा'। इसका अर्थ केवल उम्र में युवा होना नहीं, बल्कि नई दृष्टि, नई ऊर्जा और नई संभावना होना है। युवाचार्य पुरानी जड़ों को काटकर नया वृक्ष नहीं बनाते; वे उन्हीं जड़ों से नई शाखाओं को जन्म देते हैं। इसलिए युवाचार्य केवल भविष्य के उत्तराधिकारी नहीं... भविष्य के निर्माता होते हैं। आज हम युवाचार्य श्री महावीरकुमारजी का वर्धापना कर रहे हैं तो हमारी शुभकामना केवल इतनी न हो कि 'आपका कार्यकाल मंगलमय हो।'
हमारी कामना हो.
आपकी दृष्टि इतनी दूरदर्शी हो कि भविष्य पहले दिखाई दे।
आपकी वाणी इतनी सहज हो कि युवा मन तक पहुँच सके।
आपकी दृढ़ता इतनी प्रखर हो कि मर्यादा कभी कमजोर न पड़े।
आपकी विनम्रता इतनी गहरी हो कि पद कभी व्यक्तित्व से बड़ा न हो।
और आपकी संघनिष्ठा इतनी मजबूत हो कि व्यक्तिगत सीमाओं से ऊपर धर्मसंघ दिखाई दे।
क्योंकि कुछ अवसर ऐसे होते हैं जब हम केवल किसी व्यक्ति का अभिनंदन नहीं कर रहे होते, हम भविष्य का स्वागत कर रहे होते हैं।
युवाचार्य श्री महावीरकुमारजी के वर्धापना पर कोटिशः मंगलकामनाएँ।
परंपरा आपके हाथों में सुरक्षित रहे, और आपके हाथों से आने वाली पीढ़ियों तक और अधिक प्रकाश बनकर पहुँचे। आप केवल अगले आचार्य की प्रतीक्षा नहीं है। आप आने वाले तेरापंथ की तैयारी है।