प्रज्ञा-निलयम् में युवाचार्यप्रवर का शुभागमन

रचनाएं

साध्वी शुभप्रभा l साध्वी भास्करप्रभा

प्रज्ञा-निलयम् में युवाचार्यप्रवर का शुभागमन

योगक्षेम वर्ष का सुपावन अवसर। आषाढ़ शुक्ला त्रयोदशी का सुमंगल दिन। तेरापंथ आद्य प्रणेता परम प्रतापी आचार्यश्री भिक्षु का त्रिजन्म शताब्दी समारोह का समापन समारोह। परमपूज्य महातपस्वी, महामनस्वी, महायशस्वी, महातेजस्वी, आचार्य श्री महाश्रमण की पवित्र आभावलय की सान्निकट सन्निद्धि। दिव्यलोक सी सुधर्मा सभा का दिव्य नजारा। चतुर्विध धर्मसंघ की गौरवमय उपस्थिति। महामना स्वामीजी के प्रति हार्दिक श्रद्धार्पण, सर्वात्मना समर्पण, विनम्र कृतज्ञ भाव अभिव्यक्त करते हुए आचार्यवर द्वारा यकायक एक महती उद्घोषणा हुई - “आज मैं अपने उत्तराधिकारी की नियुक्ति करना चाहता हूँ।” समुपस्थित श्रद्धालु परिकर हर्षाेत्फुल्ल, उत्सुकमना होकर उस मनभावन चित्ताकर्षक दृश्य को देखकर रोमांचित हो गया। मनोनयन की सारी प्रक्रिया-प्रविधि का अवलोकन कर सब धन्यता, कृतार्थता की अनुभूति करने लगे। पूरे माहौल में खुशियों की नई तरंगें, नई उमंगें महसूस हुईं। ’‘जय-जय नंदा, जय-जय भद्दा’, ‘धन्य दिवस आज रो रे’’ के मधुर स्वर मुखरित हुए। बधाईयों, शुभकामनाओं के भाव प्रस्तुत हुए। सब ओर आत्मतुष्टि की लहरें दिखाई देने लगीं। कर्त्ता, नियोक्ता और द्रष्टा सब प्रसन्न थे। बहुतों ने अपनी जिंदगी में पहली बार निर्वाचन समारोह का शुक्ल धाराओं से ओत-प्रोत नजारा देखा।
31 जुलाई को प्रभातकालीन गुरुदर्शन के समय सकल साध्वी समाज का प्रतिनिधित्व करते हुए आदरास्पद साध्वीप्रमुखाश्रीजी ने बहुत उत्कट भाव के साथ पूज्य चरणों में निवेदन किया - ’गुरुदेव की मर्जी हो तो श्रद्धेय युवाचार्यश्री को प्रज्ञा निलयम् भिजवाने का अनुग्रह करवाएं ताकि साध्वी समाज अपने प्रांगण में उनकी वर्धापना कर सके और युवाचार्यवर से अमृत पाथेय प्राप्त कर सके।’
प्रार्थना के औचित्य को मध्यनजर रखते हुए पूज्यवर ने तत्काल स्वयं सुनिश्चित कर दिया कि युवाचार्यजी 1 अगस्त को लगभग 7 बजे प्रज्ञा निलयम, 2 अगस्त को गौतम ज्ञानशाला और 3 अगस्त को सेवा मंदिर में जाएं।
ज्ञातव्य है परमपूज्य गुरुदेव श्री तुलसी ने योगक्षेम वर्ष में महाश्रमण पद की नियुक्ति करने के बाद महाश्रमण मुनि मुदितकुमार को प्रवास-स्थल अमृतायन में भेजा था।
सावन की पहली बौछार के आगमन के इंतजार की तरह आनंद की लहरों में हिलोरे ले रहा था सम्पूर्ण साध्वी समाज। सभी के अन्तस्तल का अमित उत्साह मुखर होने लगा। हर गलियारे में, हर कमरे में, मन के हर कोने में सिर्फ एक ही गूंज थी - यहाँ कल हमारे युवाचार्यप्रवर पधारेंगे।
कईओं की लेखनी ने कागज की धरती पर स्वागत, अभिनंदन के अक्षर स्वर अंकित किए तो कहीं जिज्ञासित नयन पूछ रहे थे - क्या होगा? 1 अगस्त के प्रातः लगभग 7 बजे तेरापंथ धर्मसंघ के नव मनोनीत युवाचार्यश्री की प्रतीक्षा पलक पावड़े बिछाएं खड़े साध्वी समाज के नेत्र विस्मय से तथा हर्ष से विस्फारित, प्रफुल्लित हुए जब तेरापंथ गगनांगण का नवोदित सुपावन नक्षत्र प्रज्ञा निलयम् में अपनी आध्यात्मिक रश्मियां बिखेरने लगा। प्रसन्न वातावरण में हुए जयघोष और मधुरिम स्वरलहरियों के साथ श्रद्धेय युवाचार्य का प्रज्ञानिलयम् के प्रांगण में पदार्पण हुआ। पहले दशक से लेकर दसवें दशक तक की सब साध्वियां अपने आप में धन्यता की अनुभूति करने लगीं।
संपूर्ण साध्वी समाज की ओर से साध्वीप्रमुखाश्रीजी ने श्वेत हंसों की टोली लेकर पधारे तेरापंथ मानसरोवर के राजहंस की अगवानी की और उन्हें पट्ट पर विराजमान होने का निवेदन किया। श्रद्धेय युवाचार्यश्री सहज भाव से पट्ट पर आसीन हो गए। चारों ओर साध्वियों का परकोटा सा बन गया। साध्वियों ने युवाचार्यप्रवर के स्वागत व निवेदन से आपूरित एक मधुमय गीत का संगान किया, जिसमें ये भाव गुंफित थे - आपश्री हमें संस्कृत ग्रंथ, कालु-कौमुदी व तत्त्वज्ञान पढ़ाएं। नई-नई राग-रागिनियां सिखाएं। आपकी दृष्टि होगी, हमारे कदम उधर ही उठेंगे। गीत के इन अनुनय-विनय के बोलों को सुनकर युवाचार्यश्री की मंद मुस्कान कुछ अलग ही अंदाज लिए हुए थी। साध्वीप्रमुखाश्रीजी ने प्रसन्नता के पारावार में अवगाहन करते हुए फरमाया - आचार्यश्री ने महती कृपा करके आपश्री को प्रज्ञा निलयम् भिजवाया है। युवाचार्यप्रवर का जीवन विनम्रता, निरभिमानता व समर्पण जैसे गुणों का समवाय हैं। हमारे साध्वी समाज में भी इन्द्रिय निग्रह की साधना बढ़े। साध्वी समाज उपयोगी व तेजस्वी बनें। आचार्य श्री महाप्रज्ञजी आपश्री की विशेषताओं से प्रसन्न होकर फरमाते थे कि ‘महावीर तो हाली का हाली है और बाबा का बाबा’ है। प्रत्येक कार्य में आपकी सहजता हमारे लिए स्वयं प्रेरणा है। बस महायुगल की सन्निधि में साध्वी समाज चहुंमुखी विकास करे। यही अभिलषणीय है।
शुभागमन के इस मंगल अवसर पर साध्वीवर्याजी ने हर्षाभिव्यक्ति करते हुए कहा - आप श्री जैसे सक्षम युवाचार्य प्रवर को पाकर सम्पूर्ण संघ खुशहाल है, निहाल है। आप श्री विरल विशेषताओं के पुंज हैं। आप संघ में नित नए आयाम खोलें। आपके नेतृत्व में साध्वी समाज विकास के नए पायदान छुए। यह काम्य है।
प्रत्येक साध्वी का रोम-रोम पुलकित था। भाव प्रस्तुति के लिए उत्कंठित हो रहे थे। सबके अन्तर्मन के भावों का समाहार करते हुए शासन गौरव साध्वी राजीमतीजी, शासन गौरव साध्वी कनकप्रभाजी, शासन गौरव साध्वी कल्पलताजी, शासन श्री साध्वी जिनप्रभाजी, साध्वी सुषमाकुमारीजी एवं शासनश्री साध्वी बसंतप्रभाजी ने अत्यल्प शब्दों में अपनी प्रसन्नता की अभिव्यक्ति दी।
साध्वीप्रमुखाश्रीजी के निवेदन पर युवाचार्यप्रवर ने साध्वी समाज को अपने प्रथम प्रेरक उद्बोधन में फरमाया - “हम सभी सौभाग्यशाली हैं कि हमें भैक्षव शासन नन्दनवन में ज्योतिपुंज आचार्यश्री महाश्रमणजी की पावन सन्निधि में साधना करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है। हम सब आराधनारत हैं। तेरापंथ का साध्वी समाज तेजस्वी बनें! इसके लिए आवश्यक है हम पूज्य गुरुदेव श्री तुलसी की प्रेरणा- ‘खबरदार जो सुविधावाद पनप पाया है’ को स्मृति में रखे। यानी श्रम की चेतना हर क्षण जागृत रहे। इस परिप्रेक्ष्य में युवाचार्यश्री ने परमपूज्य आचार्यश्री महाप्रज्ञ द्वारा रचित- ‘भिक्षु स्वामी से सन्दर्भित गीत का यह पद्य समुच्चरित किया-
‘सुविधावादी नहीं बनेंगे, मानस को सरसाएंगे
मरणधार सुधमार्ग मर्म को, हम आदर्श बनाएंगे
अनुशासन की हर रेखा में, अरुणिम रंग भरेंगे हम
मर्यादा के अक्षर-अक्षर का सम्मान करेंगे हम
आकर्षण है देव तुम्हारे तेजस्वी संन्यास में।’
आओ देखो करो कसौटी चंदा है आकाश में,
गाओ-गाओ गीत प्रगति का जीना है विश्वास में।
हमारे आदर्श गुरुदेव को हमेशा अपने सामने रखे। जब हमारा संन्यास तेजस्वी होगा, साधना तेजस्वी होगी तो चतुर्विध धर्मसंघ तेजस्वी बनेगा और यह हमारा प्रथम कर्तव्य है। इसके लिए अनासक्ति व अप्रमत्तता की चेतना हमेशा झंकृत रहे। आज पढ़ी-लिखी विदुषी साध्वियां हैं, विद्वता के साथ-साथ हमारा पारस्परिक सौहार्द- आत्मीय भाव भी बढ़ना चाहिए। ज्ञान-ध्यान की पावन गंगा हमारे भीतर अनवरत प्रवाहमान रहे। परम पूज्य आचार्यवर ने प्रवचन में फरमाया था- पांचवें आरे के अंतिम समय में हमारे धर्मसंघ के साधु-साध्वियां हो। हम सब उस परम पवित्र धर्मसंघ के सदस्य हैं जिसके प्रवर्तक आ. भिक्षु हैं और हमें पवित्र आचार्य परम्परा प्राप्त है। वर्तमान में परम पावन आचार्यश्री महाश्रमणजी का निर्मल अनुशासन हमें उपलब्ध है। ऐसे कलियुग में ऐसा धर्मसंघ मिलना हमारे महान् सौभाग्य का सूचक है। आचार्य भिक्षु के संघ में प्रथम साध्वी कुशलांजी थी और प्रथम साधु थे थिरपाल-फतेहचन्द! ये प्रथम नाम हमें प्रेरणा देते हैं कि हम संयम में थिर व कुशल बनें, ताकि लक्षित मंजिल को फतह कर सके! इस प्रकार संघीय प्रभावना और आत्म साधना का दीप जलाने का ओज भरा आह्वान व श्रमशीलता का प्रेरणा पाथेय सुनकर साध्वीवर्ग मंत्रमुग्ध हो गया।
अन्त में साध्वीप्रमुखाश्रीजी ने नव मनोनीत युवाचार्यप्रवर के करकमलों में एलवान उपहृत कर भारतीय अतिथि परम्परा का सम्यक् निर्वहन किया। साध्वियों के निवेदन पर युवाचार्यप्रवर ने प्रज्ञा निलयम् के प्रत्येक कमरे में पदार्पण कर उसे पावन किया।
हर कमरे में कुर्सी पर स्थित आसन युवाचार्य-प्रवर के आसीन होने से शोभायमान होना चाहता था। अपने-अपने कमरे के आगे साध्वियां हाथ में कागज लेकर मंगल-भावों को उद्रेक भरे गीतों से वर्धापना कर रही थीं। सबने अपने भीतर नई तरंग, नई उमंग महसूस की। सबकी चेतना में मानो जागरण का नया रक्त परिसंचरण हो गया। हर गली, हर मोड़ और हर कमरे के आगे संगीत की मधुर ध्वनियां गुंजायमान थीं। ऐसा महसूस हो रहा था कि प्रज्ञा निलयम् की प्रत्येक कोशिका, मांसपेशी, ऊतक, अवयव सब सुरतालमय बन गए हैं।
हर कक्ष में श्रद्धेय युवाचार्यप्रवर की अगवानी स्वयं श्रद्धेया साध्वीप्रमुखाश्रीजी ने की। ऊपर की मंजिल हो या नीचे की। महासतीवर प्रत्येक कमरे में युवाचार्यप्रवर के स्वागत में पधारी और प्रत्येक वर्ग का परिचय करवाकर साध्वी समुदाय को भाव-विभोर कर दिया।
दिल-दिमाग के छलकते उत्साह, प्रमुदित पुलकन और वे सुनहरे पल साध्वियों की आंखों में हमेशा के लिए कैद हो गए। लगभग 85 मिनट पल का समय कुछ पलों में ही व्यतीत हो गया। साध्वियों की लंबी कतार युवाचार्यश्री को ‘महाश्रमण विहार’ पहुंचाने के लिए अनुगामी बनी।
श्रद्धेय युवाचार्यप्रवर के स्नेहिल आत्मीय आशीर्वाद में उठे हाथ का संकेत पाकर पुनः प्रज्ञानिलयम् की ओर लौटता साध्वीवृन्द श्रीचरणों में प्रणत था।
एक ही पंक्ति सबके मुख से प्रतिध्वनित हो रही थी -
‘अभ्यर्थना के इन स्वरों में एक स्वर मेरा मिला लो’