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अलौकिक बालक महावीर के उत्कर्ष जीवन पोथी की कहानी
( पिछले अंक का शेष)
२. आचार्यप्रवर पर प्रभाव : ससंघ फलसुंड निवासी श्रावक समाज व राजपूत आदि गंगाशहर की धरा पर पहुंचे जहाँ आचार्यप्रवर विराजमान थे। गुरु दर्शन कर आचार्यप्रवर के निर्देशानुसार बालक महावीर ने ससंघ श्री चरणों में गीत सुनाया। गुरुकुलवासी संतों ने सोचा इतना सुन्दर मधुर संगीत कौन गा रहा है; वह साधुओं के आकर्षण का केन्द्र बन गया। दूसरे दिन प्रवचन में आचार्यश्री महाप्रज्ञजी ने फरमाया— 'वह बालक महावीर (फलसुंड वाला) कहां है, दोबारा वही गीत सुनाओ।' तत्काल श्रावकों सहित बालक महावीर आगे आया और वंदना कर स्वरलहरी के साथ गीत का संगान किया।
३. चातुर्मास की घोषणा : स्वरलहरियों से वातावरण पुलकित-उल्लसित हो झूम उठा तथा महावीर के मधुर कोकिल कण्ठों की प्रशंसा करते हुए 'बस मोर-बस मोर' कहकर बालक को कंधों पर ऊंचा उठा लिया गया। अन्तर्यामी आचार्यप्रवर की दृष्टि महावीर में छिपी प्रतिभा पर टिक गई। आचार्य प्रवर की पर्युपासना में फलसुंडवासी पहुंचे और चातुर्मास की पुरजोर अर्जी की— 'भंते! साध्वी राकेशकुमारीजी को आपने भेजा, साध्वीश्री अच्छा काम और मेहनत कर रहे हैं। उनके बिराजने से बालक महावीर तैयार हो रहा है, दीक्षा लेगा, वैरागी है। धर्म-ध्यान की अच्छी जागृति आई है। हमें तो अब चातुर्मास चाहिये।'
४. विनोद व स्वीकृति : आचार्य प्रवर ने विनोद के लहजे में पूछा— 'किसका चातुर्मास चाहिये?' तत्काल बोले— श्रद्धा-भक्ति में लीन श्रावक बोल उठे— 'हमें तो साध्वी राकेशकुमारीजी का चौमासा देने की कृपा करावें।' श्रावकों की भावना को गौर से सुन अमिय दृष्टि बरसाते हुए परम श्रद्धेय आचार्य प्रवर ने फरमाया— 'सन 2001 का चातुर्मास साध्वी राकेशकुमारी बायतू फलसुंड में करे।' गुरुदेव के मुखारविन्द से यह घोषणा सुन भक्तों के मन मयूर नाच उठे क्योंकि तेरापंथ धर्मसंघ के इतिहास में (फलसुंड में) प्रथम चातुर्मास होने जा रहा था; यह इतिहास सृजन का मंगल क्षण था।
५. प्रथम ऐतिहासिक चातुर्मास का स्वरूप: जैसलमेर जिले के प्रथम गांव फलसुंड की धरा पर कोचर कुल में झोंपड़ी में जन्मे, मोटा खाना, मोटा पहनना, सीधे-साधे लोग, धर्म व गुरु के प्रति अनंत श्रद्धा-भक्ति में भीगे, सहज संयमित जीवन जीने वाले, आधुनिक सुख-सुविधाओं से दूर खेतीबाड़ी करने वाले लोग हैं, व्यापार संबंधी कुछ दुकानें भी हैं। वहाँ साध्वी श्री राकेश कुमारी जी तेरापंथ के 143 वर्षों के इतिहास में गुरु आज्ञानुसार प्रथम चातुर्मास करने जा रही थीं। तीन महीने बिराजने के उपरांत 5 महीने का चातुर्मास मिल गया; परम पूज्य गुरुदेव ने प्रथम बार चातुर्मास करने का सौभाग्य मुझे बक्साया। साध्वी श्री राकेश कुमारी जी, साध्वी सुमति कुमारी जी (लाडनूं), मुक्ति प्रभा जी (सिरसा), साध्वी मलय विभा जी (लाडनूं) का चातुर्मास फरमाया। जनता में नया उत्साह, उल्लासमय वातावरण छा गया तथा समस्त सिंवाची-मालाणी चोखले में हर्ष की लहर दौड़ गई।
8. बीदासर यात्रा, दीक्षा का संकल्प एवं पारिवारिक स्वीकृति :
१.बीदासर प्रस्थान: गुरु कृपा से पिताजी की तो आज्ञा मिल गई पर मां की आज्ञा लेना थोड़ा कठिन था। मां को बार-बार समझाने की काफी चेष्टा रही। मेरी बात स्वीकार कर सम्मान करते हुए पिताश्री सवाईचन्दजी चौमासे के अंतिम सप्ताह में मंगल पाठ सुन बालक वैरागी महावीर को गुरु दर्शन कराने बीदासर ले गये। मैंने गीत बनाकर महावीर को देते हुए कहा— 'सवाईजी, गुरुदेव के सामने ये गीत गाते हुए महावीर को गुरुचरणों में भेंट कर देना।'
२. गुरु आदेश : पिता-पुत्र ने बीदासर में गुरु दर्शन किये और मधुर स्वरलहरी के साथ गीत का संगान किया। गीत के माध्यम से अपनी अर्जी भी गुरु चरणों में रखी; उस परिसर में उपस्थित सभी लोग गीत सुनने में तल्लीन हो गये। आचार्यप्रवर ने गीत ध्यान से सुना और करूणादृष्टि बरसाते हुए महावीर को साधु प्रतिक्रमण सीखने का आदेश फरमाया। तभी से तेरापंथ इतिहास में नए अध्याय का पृष्ठ जुड़ गया।
(यहाँ मूल पाठ्य की दूसरी गीतिका की पंक्तियाँ हटाई गई हैं)
३. संस्कार व दृढ संकल्प : चातुर्मास में कई धर्मप्रभावक कार्यक्रमों के साथ मैंने महावीर पर ध्यान केन्द्रित किया; जैन, अजैन, राजपूत आदि में संघीय संस्कारों का बीजारोपण करने का प्रयास किया। बालक महावीर को कसौटी पर कसते हुए उसे कई बार मैं पूछती— 'कौनसा मार्ग लेगा- संसार का या मोक्ष का?' संसार की नश्वरता व अशाश्वतता तथा मनुष्य भव का चित्रण खींचते हुए मैं महावीर बालक से कई बार कहती— 'महावीर तू अच्छा साधु बनेगा, अच्छा दीपेगा, भाग्यशाली लगता है। एक बात कहना चाहती हूं कि आज रात्रि में भिक्षु स्वामी का नाम लेकर दृढ निश्चय कर लेना कि मेरे को संसार में रहना है या साधु बनना है।'
५. दृढ़ निश्चय : अगले दिन महावीर ने दर्शन किये; मैंने पूछा, तो महावीर बोला— 'दृढ़ संकल्प कर लिया, आपकी बात मानूंगा और दीक्षा ही लूंगा।' मैंने कहा— 'देख महावीर, मां से डरना नहीं, मोह मत करना, मां तेरी परीक्षा ले रही है। मजबूती रखना, घबराना मत, विचलित मत होना। गुरुदेव सिंवाची मालाणी पधारने वाले हैं; पक्का रहेगा तो दीक्षा हो जायेगी। पिताजी तो सरल हैं, मां से आज्ञा लेना मुश्किल है, पर गुरु कृपा से मुश्किल काम भी सरल बन जाता है।'
६. सहयोगी साध्वियाँ : ऐसे कई बार मुमुक्षु महावीर को समझाने का प्रयास निरंतर चालु रहता कि दीक्षा लेकर सभी से हटकर विशिष्ट संत बनना है। स्व० साध्वी सुमतिकुमारीजी व साध्वी मलयविभाजी ने भी वैराग्यभाव जगाने, संस्कार देने व सिखाने में महावीर पर काफ़ी मेहनत की। सा. मलयविभाजी तो वैरागी महावीर के साथ ही 'तेरापंथ प्रबोध', 'श्रावक सम्बोध' आदि सीखती थीं।
७. माता जी की स्वीकृति : गुरु कृपा से पिताजी ने तो आज्ञा दे दी पर मां ने नहीं दी थी। मां को बार-बार समझाने की चेष्टा करती रहती। मां कहती— 'महाराज ये अभी बच्चा है, कुछ भी जानता नहीं है।' मैं कहती— 'छगनीबाई, ठीक कह रहे हो पर छोटा ही तो मोटा बनता है! दीक्षा देने के बाद खुशी मनाओगी!'
9.मुनि महावीरकुमारजी के युवाचार्य पद पर अभिनंदन व मंगल भावनाएँ
मैं युवाचार्य मनोनीत होने पर अति उल्लसितमना अनन्त-अनन्त मंगल कामना, कोटि-कोटि वंदना, अभिवंदना व वर्धापना करती हूँ।
शत-शत मंगल कामना करती हूँ कि उपलब्धि के हर पड़ाव पर आप बढ़ते जायें, चढ़ते जायें व नया इतिहास गढ़ते जाएं।
संपूर्ण संघ आचार्य प्रवर व आपके इंगित-आकार के प्रति समर्पित है।