तेरापंथ की युवाचार्य परंपरा

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मुनि जिनेश कुमार

तेरापंथ की युवाचार्य परंपरा

प्राचीन काल से ही उत्तराधिकारी के सम्बन्ध में तेरापंथ धर्मसंघ की यह विशिष्ट परंपरा रही है कि आचार्य बनने की अर्हता प्राप्त करें लेकिन आचार्य बनने की आकांक्षा नहीं रखें। इसी का परिणाम है कि तेरापंथ धर्मसंघ एक आचार्य के नेतृत्व में अविकल रूप में कीर्तिमान एवं विकासमान हो रहा है। किसी व्यक्ति ने आचार्य भिक्षु से पूछा आपका धर्मसंघ कब तक चलेगा ? आचार्य भिक्षु ने कहा जब तक साधु-साध्वी शुद्ध नीति, एक नेतृत्व, शुद्ध आचरण, व्यवहार एवं नैसर्गिक न्याय के आधार पर चलते रहेंगे तब तक संघ अबाध गति से चलता रहेगा। किसी भी संगठन का आधार उसका सिद्धांत एवं जीवन दर्शन होता है न कि संख्या। शिथिलाचार किसी भी धर्मसंघ को ले डूबता है। तेरापंथ के आद्य प्रवर्तक आचार्य भिक्षु सर्वप्रथम स्थानकवासी परंपरा में दीक्षित हुए। किन्तु वे सत्य के अनुसंधाता थे। उन्होंने शास्त्रों का गहराई से अध्ययन किया। उनके विचार नहीं मिलने के कारण वे अपने साथियों के साथ वि.सं. १८१७ राम नवमी के दिन पृथक हो गए और अपने साथियों के साथ केलवा में नवदीक्षा ग्रहण कर तेरापंथ की विधिवत् स्थापना की। कालान्तर में संघ को अविच्छिन रखने की दृष्टि से उन्होंने वि.सं. १८३२ में एक मर्यादा पत्र का निर्माण किया और अपने परम शिष्य मुनि भारमल जी को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया। संघ का यह मर्यादा पत्र अनेक झंझावातों के बावजूद आज भी उसी रुप में संघ को अनुशासित कर रहा है। यह मर्यादा पत्र तेरापंथ धर्मसंघ का दुर्लभ दस्तावेज है जिसका मर्यादा महोत्सव के अवसर पर सार्वजनिक रुप से वाचन किया जाता है। विभिन्न देशों के कानूनविज्ञों द्वारा निर्मित संविधानों में इतने समय में अनेको संशोधन, परिवर्धन एवं परिवर्तन हो चुके है। किन्तु आश्चर्य है कि २५० वर्षों के इतिहास में तेरापंथ की इन व्यवस्थाओं में कोई परिवर्तन नहीं हुआ। तेरापंथ के भावी आचार्य का मनोनयन तेरापंथ के वर्तमान आचार्य ही करते है। नियमानुसार इसकी दो विधियां है। पहली विधि यह है जनसभा में सार्वजनिक रुप से उत्तरीय ओढ़ाकर उद्घोषणा करना। द्वितीय विधि यह है कि आचार्य द्वारा प्रच्छन्न पत्र लिखकर रख दिया जाना। जिसे आचार्य के स्वर्गारोहण के पश्चात् संघ के विशिष्ट साधुओं द्वारा खोलकर सार्वजनिक करना। इसी प्रक्रिया के अन्तर्गत आचार्य भिक्षु द्वारा वि.सं. १८३२ में लिखे संविधान के तहत् युवाचार्य के नाम की उ‌द्घोषणा के बाद का एक लेख पत्र तैयार किया जाता है। जिसे हस्ताक्षर हेतु सब साधु-साध्वियों को प्रेषित किया जाता है और सबके उन पर हस्ताक्षर होते है। आचार्य भिक्षु द्वारा संस्थापित यह तेरापंथ धर्मसंघ अबाध गति से अपनी इसी परंपरा का निर्वहन कर रहा है। इस परंपरा में आचार्य भिक्षु से लेकर आचार्य श्री महाप्रज्ञ तक दस आचार्य हो चुके है। वर्तमान में ग्यारहवें आचार्य श्री महाश्रमण जी की गौरवमयी अनुशासना में तेरापंथ धर्मसंघ प्रगतिशील है। आचार्य भिक्षु ने ४९ वर्ष की अवस्था में अपने पीछे २८ वर्षीय मुनि भारमलजी को बिठोड़ा (मारवाड़) ग्राम में अपना युवाचार्य घोषित किया। आचार्य भारमलजी ने ७३ वर्ष की अवस्था में ३१वर्षीय मुनि रायचन्दजी को केलवा में अपना युवाचार्य घोषित किया। आचार्य रायचन्दजी ने ४७ वर्ष की अवस्था में ३४ वर्षीय मुनि जीतमलजी को नाथद्वारा में अपना युवाचार्य घोषित किया। आचार्य जीतमलजी ने ६० वर्ष की अवस्था में २३ वर्षीय मुनि मघराज जी को चुरु में अपना युवाचार्य घोषित किया। आचार्य मघराजजी ने ५२ वर्ष की अवस्था में ३७ वर्षीय मुनि माणकलाल जी को अपना युवाचार्य सरदारशहर में घोषित किया। आचार्य कालूरामजी ने ६० वर्ष की अवस्था में २२ वर्षीय मुनि तुलसी को अपना युवाचार्य गंगापुर में घोषित किया। आचार्य तुलसी ने ६४ वर्ष की अवस्था में ५८ वर्षीय महाप्रज्ञ मुनि नथमल को युवाचार्य राजलदेसर में घोषित किया। आचार्य महाप्रज्ञजी ने ७७ वर्ष की अवस्था में महाश्रमण मुनि मुदित कुमारजी को वि.सं. २०५४ भाद्रव शुक्ला द्वादशी को गंगाशहर में युवाचार्य पद पर प्रतिष्ठित किया।  यह पहला अवसर था कि युवाचार्य की घोषणा सार्वजनिक रुप से समारोह पूर्वक की गयी। कोई भी आचार्य अपने संघ के साधुओं में से निम्नांकित अर्हता वाले योग्य साधु को ही अपना युवाचार्य बनाते है। आचार्यश्री महाश्रमण जी ने 64 वर्ष की अवस्था में 38 वर्षीय मुख्य मुनि श्री महावीर को वि.सं. 2083 आषाढ़ शुक्ला त्रयोदशी, 27 जुलाई 2026 को लाडनूं, जैन विश्व भारती में युवाचार्य पद पर प्रतिष्ठित किया। युवाचार्य श्री महावीर तेरापंथ धर्मसंघ के नौवे युवाचार्य है। आपने अपने विनय, समर्पण, सेवाभाव व योग्यता के विकास से गुरु के हृदय में स्थान बनाया है। छोटे से गाँव फलसूण्ड से निकले अनगढ़ पत्थर को करीने से तराशकर अनमोल हीरे के रूप में आचार्य श्री ने आपको धर्मसंध के सामने प्रस्तुत किया है। आशा ही नहीं विश्वास है कि आप आचार्य श्री के भरोसे पर खरा उतरेंगे और धर्मसंघ की सेवा में अपनी क्षमताओं का, योग्यताओं एवं प्रतिभावों का उपयोग कर आचार्य श्री के सपनों को पूरा करेंगे। नये युवाचार्य के मनोनयन पर उन्हें वर्धापित करते है और आपके प्रति अनंत-अमेट मंगलकामना व्यक्त करते हैं।