मंगलमय निर्णय निश्चय ही गुरु-दृष्टि की दिव्य प्रज्ञा

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मुनि रमेश कुमार

मंगलमय निर्णय निश्चय ही गुरु-दृष्टि की दिव्य प्रज्ञा

परम पूज्य युगप्रधान अनुशास्ता आचार्यश्री महाश्रमणजी द्वारा तेरापंथ धर्मसंघ की अक्षुण्ण परम्परा, उज्ज्वल भविष्य एवं उत्तराधिकार की विशिष्ट श्रृंखला के निमित्त मुख्य मुनि श्री महावीरकुमारजी को युवाचार्य पद पर प्रतिष्ठित करने का परम मंगलमय निर्णय निश्चय ही गुरु-दृष्टि की दिव्य प्रज्ञा, संघ-चिन्तन की विलक्षण परिपक्वता तथा दूरदर्शी नेतृत्व का अनुपमेय प्रतिफल है।
यह केवल किसी पद का अलंकरण नहीं, अपितु गुरु के निर्मल अन्तःकरण से अपने योग्यतम शिष्य पर प्रकट हुए अखण्ड विश्वास का पवित्र अभिषेक है। गुरु-विश्वास से बढ़कर किसी साधक के जीवन में न कोई उपलब्धि होती है, न कोई अलंकार। यह निर्णय श्रद्धेय मुनि महावीरकुमारजी की दीर्घकालीन तपश्चर्या, अप्रतिहत साधना, निष्कलुष विनय, गंभीर स्वाध्याय, अनुशासित जीवन, निस्पृह सेवा तथा अखण्ड संघनिष्ठा का दिव्य सम्मान है। विशेषतः आचार्यभिक्षु जन्म-त्रिशताब्दी, भिक्षु चेतना वर्ष एवं योगक्षेम वर्ष जैसे त्रिवेणी-संयोग में सम्पन्न यह घोषणा सम्पूर्ण तेरापंथ धर्मसंघ के लिए केवल उल्लास का अवसर नहीं, बल्कि इतिहास के स्वर्णाक्षरों में अंकित होने वाला एक युगान्तकारी अध्याय है। ऐसा प्रतीत होता है मानो परम्परा ने स्वयं अपने उज्ज्वल भविष्य का अभिनन्दन किया हो।
परमपूज्य आचार्यप्रवर की करुणामयी दृष्टि से श्रद्धेय मुख्य मुनिश्री महावीरकुमारजी का युवाचार्य पद पर प्रतिष्ठित किया जाना मेरे लिए शब्दातीत हर्ष, विनम्र गर्व और अनिर्वचनीय कृतज्ञता का विषय है। श्रद्धेय युवाचार्य श्री महावीरकुमारजी का व्यक्तित्व तप की दीप्ति, त्याग की निर्मलता, ज्ञान की गम्भीरता, स्वाध्याय की निरन्तरता, अध्यापन की प्रखरता, विनय की मधुरता, अनुशासन की दृढ़ता तथा संगठन-कौशल की विलक्षण दक्षता का अद्भुत समन्वय है।
उनकी सहज सरलता में गंभीरता है, उनकी मौन साधना में प्रेरणा है और उनके संतुलित नेतृत्व में धर्मसंघ के उज्ज्वल भविष्य की स्पष्ट संभावनाएँ प्रतिबिम्बित होती हैं। धर्मसंघ साधना, संस्कार, समन्वय और धर्मप्रभावना के नित नवीन आयामों का सृजन करे, यह कामना भी है और विश्वास भी।
हे परम पूज्य गुरुदेव! आपके श्रीमुख से उच्चरित यह निर्णय केवल उत्तराधिकार की घोषणा नहीं है; यह गुरु-विश्वास का महाघोष, परम्परा की अखण्डता का उद्घोष, दूरदर्शी नेतृत्व की सजीव अभिव्यक्ति तथा धर्मसंघ के मंगलमय भविष्य का पवित्र संकल्प है। यह आपके अद्वितीय विवेक और अप्रतिम दूरदृष्टा चिंतन बनकर युगों तक स्मरणीय रहेगा। परम पूज्य आचार्यप्रवर एवं श्रद्धेय युवाचार्यश्री की यह दिव्य गुरु-शिष्य परम्परा युगों-युगों तक धर्मसंघ को आलोकित करती रहे। आपके पावन सान्निध्य में तेरापंथ धर्मसंघ साधना की ऊँचाइयों, संगठन की सुदृढ़ता, संस्कृति की पवित्रता और धर्मप्रभावना के वैश्विक आयामों को स्पर्श करता हुआ निरन्तर प्रगति के नवीन सोपानों पर आरोहण करता रहे।
आप दोनों की युगल उपस्थिति धर्मसंघ के लिए आश्वस्ति का आधार, साधकों के लिए प्रेरणा का अजस्र स्रोत तथा भावी पीढ़ियों के लिए अमूल्य दिशा-सूचक बनी रहे—इसी श्रद्धाभरी मंगलकामना के साथ श्रीचरणों में बारम्बार विनत प्रणाम।