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धर्मसंघ का गौरव एवं परंपरा
हमारे आराध्य परमपूज्य भिक्षु स्वामी का यह धर्मशासन जयवंत है तथा इसमें सुरभित श्वास लेना परम सौभाग्य है। भिक्षु शासन बड़े भाग्य से मिलता है। धर्मसंघ का तत्व दर्शन, इतिहास, परंपरा और मर्यादित जीवन शैली अद्भुत है। धर्मसंघ के अभिन्न अंग बनने वाले गौरवशाली बन जाते हैं। तेरापंथ के आचार्य तीर्थंकर के प्रतिनिधि होते हैं तथा उनकी छत्र-छाया में रहने वाले साधु-साध्वी महानता को प्राप्त कर लेते हैं। कोई-कोई शिष्य इतने महान होते हैं कि वे गुरु के आसन को भी प्राप्त कर लेते हैं।
युवाचार्य पद का ऐतिहासिक दृश्य
हमने 27 जुलाई को परमाराध्य गुरुदेव की अनुकंपा से मुख्य मुनिश्री प्रवर को युवाचार्य प्रवर बनते देखा। इस अनुपम दृश्य को देखकर हम भाव-विभोर हो गए। मेरी (मुनि संयम कुमार) युवाचार्य प्रवर से बहुत आत्मीयता रही है तथा निकट से सेवा-उपासना करने का मौका मिला है। एक प्रकार से वे मेरे तारक-पुरुष हैं।
छापर में प्रतिबोध एवं संयम का संकल्प
मुझे परमपूज्य आचार्य श्री महाश्रमण के दर्शन करने का सौभाग्य जब छापर में मिला, तब श्रद्धेय मुख्य मुनिप्रवर ने मुझे आचार्य श्री भिक्षु के तीन दृष्टांतों से प्रतिबोधित किया। गुरुदेवश्री के पवित्र आभामंडल और तेजस्वी साधना ने मेरे मन को आलोकित किया और संयम रत्न को पाने के लिये मैं समुद्यत हो गया।
मुमुक्षु काल से दीक्षा तक की यात्रा
गुरुदेव श्री का फलसुंड पदार्पण मेरे लिये बहुत मंगलकारी रहा और मैं मुमुक्षु श्रेणी में प्रविष्ट हो गया और मेरी देखरेख का दायित्व मुख्य मुनिश्री जी पर आ गया। सन् 2024 में सूरत में जैसे ही मेरी दीक्षा हुई, परमपूज्य गुरुदेवश्री ने मुझे श्रद्धेय मुख्य मुनि प्रवर की सेवा में नियुक्त कर दिया। मैं संयमी बना, इसका मुझे बड़ा हर्ष और आनंद है।
युवाचार्य प्रवर का उपकार एवं संघ मर्यादा
मेरे भीतर सम्यक्त्व का संचार और दीक्षा की भावना पैदा करने का श्रेय श्रद्धेय युवाचार्य प्रवर को है। यदि वे मेरे लिये प्रवर पुरुषार्थ न करते तो मैं मतवादों के जंगल में भटक जाता। संप्रदाय बुरे नहीं होते हैं, किन्तु सांप्रदायिक अभिनिवेश बहुत बुरे होते हैं। मेरी दृष्टि में आत्म-प्रशंसा और पर-निंदा दोनों ही बुरे हैं। तेरापंथ में इनके लिये कोई अवकाश नहीं है।
फलसुंड की पावन धरा का कोहिनूर
धन्य है फलसुण्ड की धरा, जहां पर एक कोहिनूर हीरा प्रकट हुआ। हीरे का मूल्य तो सफल जौहरी ही जानते हैं। युवाचार्य श्री हीरे के समान हैं तो परमपूज्य आचार्य श्री सफल जौहरी। तेरापंथ धर्मसंघ हीरों की खान है। इसमें मानव रूपी हीरे अर्थात् महामानव पैदा होते रहते हैं।
भावी शासन व्यवस्था एवं आचार्य श्री के प्रति कृतज्ञता
हम भाग्यशाली और गौरवशाली हैं कि हमें आचार्य श्री भिक्षु का परम पावन धर्मसंघ मिला तथा वर्तमान में एकादशम अधिशास्ता आचार्य श्री महाश्रमण का पुनीत शासन। शासन की अक्षुण्णता तेरापंथ धर्मसंघ की निर्मल नीति है। अतः आचार्य प्रवर यथासमय युवाचार्य की उद्घोषणा कर अपने परम कर्त्तव्य की इतिश्री कर देते हैं। परमाचार्य आचार्य श्री ने युवाचार्य श्री का उद्घोष कर धर्मसंघ को निश्चित और व्यवस्थित बना दिया है। भिक्षु शासन के भविष्य को समुज्ज्वल बना दिया है।
जन्मभूमि का आनंद और समर्पण
आचार्य प्रवर की इस प्रवर भावी व्यवस्था को हम शत-शत प्रणाम करते हैं तथा चिरंजीवी धर्मशासन की छत्रछाया में रहने की सुखद अनुभूति करते हैं। श्रद्धेय मुनि श्री मदन कुमारजी स्वामी मेरा सुघड़ निर्माण कर रहे हैं। मैं फलसुण्ड का हूँ, युवाचार्य श्री की जन्मभूमि से हूँ, इसका मुझे गौरव है। एक ही कुल और परिवार से संबद्ध होने से मुझे विशेष आनंद की अनुभूति हो रही है।
जय-जय तेरापंथ शासन!