युगों-युगों तक मिलता रहे आचार्य-युवाचार्य का मार्गदर्शन

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मुनि कमल कुमार

युगों-युगों तक मिलता रहे आचार्य-युवाचार्य का मार्गदर्शन

तेरापंथ धर्मसंघ एक जयवंता धर्मसंघ है। इसमें सर्वेसर्वा एकमात्र आचार्य ही होते हैं और आचार्य की आज्ञा ही सर्वोपरि होती है। धर्मसंघ का प्रत्येक सदस्य—चाहे साधु-साध्वी हों या श्रावक-श्राविका—सभी गुरुदृष्टि का हृदय से पालन करते हैं। इसी का यह सुपरिणाम है कि यह धर्मसंघ उत्तरोत्तर वर्धमान बनता जा रहा है। इस संघ में प्रत्येक साधु-साध्वी को समान अधिकार प्राप्त हैं। जिस साधु की जैसी भावना होती है, उसे उस क्षेत्र में आगे बढ़ने का अवसर दिया जाता है। इसी कारण हम देखते हैं कि कितने ही साधु-साध्वी आगम एवं तत्त्वज्ञान में पारंगत बने हैं, तो कितने ही लेखक, वक्ता, गायक, तपस्वी और मनस्वी बने हैं। इस धर्मसंघ में युवा साधु-साध्वियों की एक लंबी कतार देखने को मिलती है; इसका मुख्य कारण 'एक गुरु, एक विधान' की व्यवस्था ही है। इस संघ में दीक्षित साधु गुरु के प्रति सर्वात्मना समर्पित होता है, उसे कहीं भी और किसी के भी साथ उपयुक्त समझकर नियोजित किया जा सकता है। शिष्य-शिष्याओं की हर प्रकार की व्यवस्था गुरुदेव स्वयं करते हैं। हमें इस बात का गौरव है कि हमें समयानुकूल ऐसे आचार्य प्राप्त होते रहते हैं, जो संघ की निरंतर उज्ज्वलता और पवित्रता को बनाए रखते हैं। वर्तमान में इस धर्मसंघ के एकादशवें अधिशास्ता आचार्य श्री महाश्रमण जी हैं, जिनकी उदारता, विनम्रता, सरलता, स्वच्छता और अनुशासन शैली प्रशंसनीय ही नहीं, बल्कि अनुकरणीय भी है। आपने जो नए-नए आयाम प्रदान किए, उन्हें संपूर्ण धर्मसंघ ने हृदय से स्वीकार किया। आचार्य का प्रमुख कार्य अपने योग्य उत्तराधिकारी का चयन करना होता है। जिस दिन आपने अपने उत्तराधिकारी का चुनाव किया, उसे देखकर न केवल धर्मसंघ के सदस्यों को, बल्कि अन्य लोगों को भी गौरव की अनुभूति हुई। उत्तराधिकारी के मनोनयन के लिए किसी से परामर्श करने की आवश्यकता नहीं होती; आचार्य जिसे उपयुक्त समझें, उसे उत्तराधिकार सौंप सकते हैं। युवाचार्य श्री महावीर कुमार जी दीक्षित होते ही गुरुकुल-वास में रहे और वर्षों से आपकी तन्मयतापूर्वक सेवा कर रहे हैं। उन्होंने सुदूर प्रांतों की यात्राएं कीं और आगमों का तलस्पर्शी अध्ययन आपकी पावन सन्निधि में किया। आपने समय-समय पर गहराई से देखा-परखा, और केवल 'मुख्य मुनि' के अलंकरण से ही नहीं, बल्कि पद से भी अलंकृत किया; फिर भी किसी प्रकार के अहंकार का स्पर्श नहीं होने दिया। असाधारण व्यक्तित्व से संपन्न होते हुए भी एक साधारण शिष्य की तरह निरंतर गुरु-सेवा में तत्पर रहना आपका बड़प्पन है, जो सबके दिल-दिमाग में छा गया है। हमें गौरव है कि आचार्य श्री तुलसी ने हमें युवाचार्य महाप्रज्ञ जी दिए, आचार्य श्री महाप्रज्ञ जी ने युवाचार्य श्री महाश्रमण जी दिए, और अब आचार्य श्री महाश्रमण जी ने 'योगक्षेम वर्ष', 'भिक्षु जन्म त्रिशताब्दी' की संपन्नता तथा आचार्य भिक्षु के बोधि दिवस के अवसर पर विशाल साधु-साध्वियों की उपस्थिति में युवाचार्य श्री महावीर कुमार जी का मनोनयन करके पूरे संघ को निश्चिंत कर दिया है। तीनों ही आचार्य युगप्रधान हैं और तीनों ने अपने-अपने युवाचार्यों की नियुक्ति करके जो इतिहास रचा है, वह हम सबके लिए अत्यंत गौरव का विषय है। मैं यह मंगल-कामना करता हूँ कि युगों-युगों तक हमें आचार्य और युवाचार्य का मार्गदर्शन प्राप्त होता रहे, जिससे न केवल संपूर्ण धर्मसंघ को, बल्कि जन-जन को एक स्वस्थ, मस्त और प्रशस्त जीवन जीने की प्रेरणा मिलती रहे।