गुरुवाणी/ केन्द्र
आश्रव पर लगेगा ताला, जब प्रतिक्रमण बनेगा जीवन की सुरक्षा-माला : आचार्यश्री महाश्रमण
जैन श्वेतांबर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, महातपस्वी, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमण जी ने जैन विश्व भारती परिसर में ‘प्रतिक्रमण से क्या मिलेगा?’ विषय पर चतुर्विध धर्मसंघ को आगमिक पाथेय प्रदान किया।
प्रतिक्रमण का स्वरूप और उसके पांच प्रकार:
१. पर-स्थान से स्व-स्थान की ओर : पूज्य आचार्यश्री ने फरमाया कि 'प्रतिक्रमण' का अर्थ है लौटना। संयम से असंयम, निर्दोषता से सदोषता या अशुभ योग से शुभ योग में पुनः लौटना ही प्रतिक्रमण है।
२. पाँच आगमिक भेद : आगम में प्रतिक्रमण के पांच भेद बताए गए हैं—आश्रव द्वार प्रतिक्रमण, मिथ्यात्व प्रतिक्रमण, कषाय प्रतिक्रमण, योग प्रतिक्रमण और भाव प्रतिक्रमण।
३. सामूहिक और आत्म-निरीक्षण : सूर्योदय से पूर्व और सूर्यास्त के बाद निर्धारित समय में साधु-साध्वियों को मंडली (सामूहिक) रूप में शुद्ध उच्चारण व विधिपूर्वक प्रतिक्रमण करना चाहिए। गृहस्थों के लिए भी रात को सोने से पहले दिनभर के कार्यों का आत्म-निरीक्षण करना एक विशेष प्रतिक्रमण है।
व्रत के छिद्र ढकने के पांच महा-लाभ:
१. आश्रव निरोध : अशुभ योगों से होने वाले कर्म बंधन तुरंत रुक जाते हैं।
२. चारित्र की शुद्धि : चारित्र की धवल चादर पर लगे दोष धुल जाते हैं और संयम निष्कलंक बनता है।
३. साधना में जागरूकता : साधु आठ प्रवचन माताओं के प्रति अधिक उपयुक्त, दत्तचित्त और सजग बनता है।
४. एकता व समाधि : संयम के प्रति साधना एकरस हो जाती है
और साधु को उत्तम समाधि की प्राप्ति होती है।
पर्युषण की प्रेरणा और प्रेक्षाध्यान सम्मेलन का आगाज:
१. पर्युषण में सामूहिक प्रतिक्रमण : आचार्यश्री ने आगामी पर्युषण पर्व के संदर्भ में श्रावक-श्राविकाओं को शाम के समय सामूहिक प्रतिक्रमण में भाग लेने और शुद्ध उच्चारण के साथ जागरूक रहने की प्रेरणा दी।
२. चार संस्थाओं का चतुष्कोण: आचार्यश्री की पावन सन्निधि में दो दिवसीय 'प्रेक्षाध्यान सम्मेलन' शुरू हुआ। पूज्य प्रवर ने जैन विश्व भारती, प्रेक्षा इंटरनेशनल, अध्यात्म साधना केंद्र और प्रेक्षा विश्व भारती—इन चारों संस्थाओं को मिलकर प्रेक्षाध्यान का व्यापक प्रसार करने व शिविरों में एकरूपता रखने का निर्देश दिया।
३. संस्थापकों की अभिव्यक्ति: सम्मेलन के शुभारंभ पर अमरचंद लुंकड़, गौरव कोठारी, के.सी. जैन और गौतम बाफना ने विचार व्यक्त किए।
युवाचार्य श्री का उद्बोधन: युवाचार्य श्री महावीर कुमार जी ने कहा कि आचार्य तुलसी के शासनकाल में आचार्य महाप्रज्ञ जी द्वारा दिया गया 'प्रेक्षाध्यान' का अवदान लुप्तप्राय ध्यान परंपरा का पुनरुद्धार है। यह भौतिकता से आध्यात्मिकता की ओर मुड़ने का सशक्त माध्यम है।