गुरुवाणी/ केन्द्र
त्याग से कटेगी कर्मों की पतंग, संयम से बिखरेगा जीवन में भक्ति का रंग : आचार्यश्री महाश्रमण
जैन श्वेतांबर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, महातपस्वी, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमण जी ने सुधर्मा सभा में ‘प्रत्याख्यान से क्या मिलेगा?’ विषय पर चतुर्विध धर्मसंघ को उत्तरज्झयणाणि आगम के माध्यम से पावन देशना प्रदान की।
साधु की पर्युपासना और हेय-उपादेय का विवेक :
१. सुनने से ज्ञान की प्राप्ति: पूज्य आचार्यश्री ने फरमाया कि साधु-संतों की पर्युपासना (नैकट्य) में बैठने और वाणी सुनने से ज्ञान मिलता है। आचार्य श्री तुलसी और आचार्य श्री महाप्रज्ञ जी के प्रवचनों को सुनकर अनगिनत लोगों ने ज्ञान प्राप्त किया।
२. हेय और उपादेय का भेद: ज्ञान से विज्ञान यानी विवेक जागृत होता है। नव तत्त्वों में हिंसा, झूठ, चोरी, पाप, आश्रव आदि 'हेय' (छोड़ने योग्य) हैं, जबकि संवर, निर्जरा और मोक्ष 'उपादेय' (ग्रहण करने योग्य) हैं।
प्रत्याख्यान का मर्म और आश्रव निरोध:
१. प्रत्याख्यान का अर्थ : प्रत्याख्यान का सीधा अर्थ है—छोड़ देना या त्याग कर देना। मिथ्यात्व और अव्रत का त्याग करने से कर्मों का आगमन (आश्रव) रुक जाता है।
२. अणुव्रत का संकल्प : साधु पाँच महाव्रत अंगीकार कर सर्व-सावद्य से विरत होते हैं। यदि गृहस्थ महाव्रत न ले सके, तो उसे अपनी क्षमतानुसार छोटे-छोटे 'अणुव्रतों' को अवश्य स्वीकार करना चाहिए।
३. जागरूकता आवश्यक : प्रत्याख्यान करने और कराने वाले—दोनों का सजग होना ज़रूरी है। सोच-समझकर और अपनी क्षमता के अनुसार ही त्याग करना चाहिए, तथा त्याग के बाद उसके पालन में पूर्ण जागरूकता रखनी चाहिए। प्रतिक्रमण में प्रत्याख्यान छठा आवश्यक है।
TPF गौरव अलंकरण समारोह 2026:
सूर्यप्रकाश सामसुखा का सम्मान: आचार्यश्री की पावन सन्निधि में 'तेरापंथ प्रोफेशनल फोरम' द्वारा वर्ष 2026 का TPF गौरव अलंकरण समारोह आयोजित किया गया।