लोगस्स के पाठ से कटेगा मोहनीय कर्म, भक्ति से खिलेगा सम्यक्त्व का धर्म : आचार्यश्री महाश्रमण

गुरुवाणी/ केन्द्र

लाडनूं। 17 अगस्त, 2026

लोगस्स के पाठ से कटेगा मोहनीय कर्म, भक्ति से खिलेगा सम्यक्त्व का धर्म : आचार्यश्री महाश्रमण

तीर्थंकर भगवान महावीर के प्रतिनिधि, अहिंसा यात्रा प्रणेता, युगप्रधान आचार्य श्री महाश्रमण जी ने लाडनूं स्थित जैन विश्व भारती परिसर में ‘चतुर्विंशतिस्तव से क्या मिलेगा?’ विषय पर चतुर्विध धर्मसंघ को पावन पाथेय प्रदान किया।
चतुर्विंशतिस्तव और दर्शन विशोधि :
१. २४ तीर्थंकरों का स्तवन: पूज्य आचार्यश्री ने आगम की व्याख्या करते हुए फरमाया कि इस अवसर्पिणी काल में भरत क्षेत्र में २४ तीर्थंकर हुए हैं, जो वर्तमान में सिद्धावस्था को प्राप्त हैं। उनकी स्तुति और भक्तिभाव की अभिव्यक्ति ही चतुर्विंशतिस्तव है।
२. दर्शन मोहनीय पर चोट : आगम में पूछा गया कि चतुर्विंशतिस्तव से जीव क्या प्राप्त करता है? उत्तर है—इससे जीव को 'दर्शन विशोधि' की प्राप्ति होती है। तीर्थंकरों की निष्काम भक्ति से दर्शन मोहनीय कर्म कमजोर होता है, सम्यक् दर्शन और अधिक निर्मल बनता है तथा क्षायिक सम्यक्त्व की प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त होता है।
सिर किसके सामने झुके? — वंदन का विवेक :
१. उत्तमांग की सार्थकता : आचार्यश्री ने फरमाया कि शरीर का उत्तमांग 'मस्तक' किसके सामने झुके, यह विचारणीय है। यह शीश केवल उनके आगे झुकना चाहिए जो वास्तव में पूज्य और नमनीय हैं।
२. 'लोगस्स' पाठ की गरिमा : 'लोगस्स' के पाठ में सभी २४ केवलियों का नामोल्लेख कर वंदन किया गया है। कर्म रज से रहित, जन्म-मरण से मुक्त सिद्धों की भक्ति आरोग्य, बोधि लाभ और उत्तम समाधि का वरदान देती है।
निःस्वार्थ भक्ति से अहंकार का अंत:
१. अहंकार का क्षय : सिद्धों और वीतरागों के प्रति विनीत भाव से झुकने पर मन के अहंकार को क्षीण होने का अवसर मिलता है। जहां निःस्वार्थ समर्पण और भक्ति होती है, वहीं जीव का वास्तविक कल्याण संभव है।
२. नमस्कार महामंत्र का मर्म : आचार्यश्री ने फरमाया कि नमस्कार महामंत्र भी भक्ति का ही उत्कृष्ट पाठ है। भिन्न-भिन्न संप्रदायों में वंदना की विधियां भले अलग हों, मुख्य बात यह है कि भीतर में सच्चा भक्तिभाव होना चाहिए।