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केलवा की अंधेरी ओरी से धर्म क्रांति तक : तेरापंथ की गाथा`
साध्वी सोमयशाजी ने अपने उद्बोधन में कहा । आज आषाढ़ शुक्ला पूर्णिमा का दिन तेरापन्थ के इतिहास में गौरवपूर्ण दिन है । महामहिम आचार्य श्री भिक्षु स्वामी ने दीक्षा स्वीकार की थी । तेरापन्थ का उदय हुआ था। अनुशासन, संगठन और व्यवस्था का बीज वपन किया था तथा धर्म क्रांति का शंखनाद किया था। केलवा की अंधेरी ओरी में उत्साह पूर्ण वातावरण में आचार्य भिक्षु ने भाव दीक्षा स्वीकार की थी । हम सौभाग्यशाली है कि हमे ऐसा तेरापन्थ धर्म संघ मिला, ऐसे गुरु मिले। वर्तमान में आचार्यश्री महाश्रमणजी की छत्रछाया में रहकर आनन्द की अनुभूति कर रहे है । कार्यक्रम की शुरुआत मंगलाचरण से कविता सिंघी द्वारा हुआ। उपासक प्रकाशजी पारख ने आचार्य श्री भिक्षु स्वामी के साध्य साधना और दान, दया के बारे में बताया । डॉ. साध्वी सरलयशाजी ने गुरु पूर्णिमा पर गुरु की महिमा के बारे में विस्तार से प्रकाश डाला। साध्वी ऋषिप्रभाजी ने भक्तिपूर्ण कार्यक्रम का कुशल संचालन किया ।