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चन्द्र प्राप्ति यंत्र अनुष्ठान का आयोजन
आचार्यश्री महाश्रमण जी की प्रबुद्ध शिष्या प्रोफेसर डॉ साध्वी मंगल प्रज्ञाजी ने चन्द्रप्राप्ति यंत्र अनुष्ठान की विशेष साधना करवाई। अनुष्ठान से पूर्व विशाल साधक साधिका समुदाय को उद्बोधन प्रदान करते हुए कहा-आगम आधारित आध्यात्मिक मंत्र साधना का मूल उद्देश्य आर्तध्यान को कम करना है। अनुष्ठान का प्रयोग कर्म निर्जरा, शारीरिक, मानसिक भावनात्मक विघ्न बाधाओं को कम करने के लिए है। प्राचीन समय से जैन प्रभावक चामत्कारिक प्रयोग होते रहे हैं। मंत्र साधक महान आचार्यों का नामो उल्लेख करते हुए एवं जैन परम्परा में मंत्रों का वैशिष्ट्य बताते हुए कहा- जैन परम्परा के अनेक आचार्यों ने मंत्र पूर्वक यंत्र साधना की है। इसका वृहद् इतिहास पढनीय है । यतियुग में भी मंत्रो एवं यंत्रों के अनेक प्रयोग किए गए है। पूर्वाचार्यों ने 'नमिऊण कल्प की रचना की।
साध्वीश्री जी ने मंत्रों की सुरक्षाकवच बताते हुए अनेक ऐतिहासिक घटना प्रसंगों का श्रवण करवाया उन्होंने चन्द्र प्राप्ति सूत्र की द्वितीय गाथा का विशेष अनुष्ठान करवाया एवं सारगर्भित व्याख्या की। उन्होंने कहा कर्मोदय से व्यक्ति के जीवन में अनेक समस्याएं आती हैं जो साधना में विघ्न पैदा करती है। आन्तरिक, बाह्य विघ्न बाधाओं से निजात पाने और अशुभ कर्म विनाश के लिए साधना अपेक्षित है ।आचार्य भिक्षु ने भी करोड़ो - जप अनुष्ठान किए हैं। बीज मंत्रों के साथ आगम-गाथा का अनुष्ठान अधिक शक्तिशाली बन जाता है। प्रोफेसर डॉ साध्वी मंगल प्रज्ञा जी ने कहा- हर व्यक्ति अपने लक्ष्य को प्राप्त करना चाहता है जिन्दगी में आने वाली विषम परिस्थितियों से उबरना चाहता है, समस्यायों का समाधान चाहता है।
हमें विरासत के रूप में मंत्रों का विशेष खजाना मिला हुआ है, आवश्यक है व्यक्ति उसका सदुपयोग करें। अनुष्ठान के साथ व्रत और तप का योग विशेष फलदायी बनता है। सम्पूर्ण परिषद ने साध्वी श्री के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित की। साध्वी राजुल प्रभा जी ने उपासक दशा सूत्र के द्वारा बारह व्रत धारण की प्रेरणा दी। अनुष्ठान से पूर्व डॉ साध्वी राजुल प्रभा जी एवं साध्वी डॉ चैतन्य प्रभाजी साध्वी डॉ शोर्य प्रभा जी ने - 'अनुष्टान से जीवन आनन्दमय हो का सामूहिक संगान किया।