संस्थाएं
वंदे आचार्यवरम्, वंदे युवाचार्यवरम्
ऐतिहासिक एवं सौभाग्यशाली अवसर :
विश्वविख्यात तेरापंथ धर्मसंघ में लगभग 26 वर्षों बाद ‘वंदे आचार्यवरम्’ के भक्तिभावित स्वरों के साथ-साथ ‘वंदे युवाचार्यवरम्’ की शब्दावली का प्रयोग करने का अवसर प्राप्त हुआ है। ऐसा अवसर प्राप्त कर स्वयं को भाग्यशाली जान रहा हूँ।
आचार्य प्रवर का निश्चिंतकारी चिंतन :
तेरापंथ धर्मसंघ की एक विशेष बात है कि यहाँ किसी को चिंता नहीं करनी पड़ती, क्योंकि चिंतन करने वाले स्वयं परम पूज्य आचार्य प्रवर होते हैं। चरित्रात्माओं के एक वर्ग में किसकी नियुक्ति करनी है, स्वास्थ्य लाभ के लिए किसे किसके साथ रखवाना है, किस गाँव या शहर में किनका चातुर्मास या प्रवास करवाना है—यह सारा कार्य आचार्य प्रवर के चिंतन से हो जाता है। सेनानायक को तो इतनी सब व्यवस्थाओं के लिए श्रम का नियोजन करना ही होता है, पर उनका श्रम संघ के हर सदस्य को निश्चिंतता की अनुभूति करवाता है।
उत्तराधिकारी चयन: धर्मसंघ की अक्षुण्ण परंपरा:
ये सब आचार्य प्रवर के लिए दैनंदिन कार्य हो सकते हैं, पर धर्मसंघ की बागडोर कौन संभालेगा, यह अति महत्वपूर्ण कार्य भी एकमात्र वर्तमान आचार्य के अधिकार क्षेत्र में आता है। महामना आचार्य श्री भिक्षु ने इस धर्मसंघ को जो अक्षुण्ण जन्मघूँटी प्रदान की है—वर्तमान आचार्य अपने गुरु भाई या शिष्य को उत्तराधिकारी बनाए तो उसे सभी साधु-साध्वियाँ सहर्ष स्वीकार करें—यह हमारे धर्मसंघ का प्राणतत्व बना हुआ है। अतः उत्तराधिकारी का चयन केवल किसी पद पर नियुक्ति नहीं, बल्कि धर्मसंघ की भावी यात्रा की दिशा निर्धारित करने वाला महनीय निर्णय है।
पूर्वाभास और अगाध विश्वास का संबंध :
आचार्य श्री महाप्रज्ञ जी के सान्निध्य में आयोजित दीक्षा समारोह के समय मुनि महावीर कुमार जी का केशलोच संस्कार युवाचार्य श्री महाश्रमण जी ने किया था। लगता है, तब से ही महाप्रज्ञ, महाश्रमण और महावीर का वह तार जुड़ गया था। आगे जब बरपथार, असम में पूज्य आचार्य श्री महाश्रमण जी ने मुख्य मुनि पद पर मुनि महावीर कुमार जी की नियुक्ति की, तब फरमाया था कि, 'आज मैं 90% निश्चिंत हो गया हूँ।' यह केवल विश्वास का प्रमाण नहीं था, बल्कि वर्षों के चिंतन, परख और दूरदृष्टि का प्रमाण था।
तेरापंथ का अनुपम नेतृत्व निर्माण मॉडल :
आज विश्व में अनेकों प्रकार के ट्रेनिंग मॉड्यूल चलते हैं, लीडरशिप डेवलपमेंट के कोर्सेस चलते हैं, पर जब तेरापंथ धर्मसंघ की साधु संस्था को देखते हैं, तो यहाँ अनुशासन, प्रबंधन कौशल, व्यक्तित्व और नेतृत्व निर्माण का जो सुंदर क्रम चलता है, वह अन्यत्र ढूँढ पाना मुश्किल है। यहाँ नेतृत्व का निर्माण किसी कक्षा या कुछ दिनों के प्रशिक्षण से नहीं, बल्कि वर्षों की साधना, अनुशासन, सेवा, जिम्मेदारियों और निरंतर मार्गदर्शन से होता है। आचार्य प्रवर के सान्निध्य में यह प्रशिक्षण जीवन की प्रत्येक परिस्थिति में निरंतर चलता रहता है।
बहुमुखी प्रतिभा और विकास की यात्रा :
श्रेष्ठ श्रुताराधक मुख्य मुनि प्रवर शुरुआती दिनों में अपनी सुमधुर और ओजस्वी वाणी से गीतों का संगान कर श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर देते थे। फिर कभी-कभी आपश्री वक्तव्य के माध्यम से भी जनता को लाभान्वित कराते। कुछ समय बाद आपश्री बहुश्रुत परिषद के संयोजक के रूप में मनोनीत हुए। आगे आचार्य प्रवर ने आपको घरों में पगलिए के लिए भिजवाना प्रारंभ किया। इतने सब कार्यों में जहाँ एक ओर आपश्री का विकास हुआ, वहीं धर्मसंघ के हर श्रावक-श्राविका के मन-मस्तिष्क में मुख्यमुनि प्रवर ने अपना स्थान बना लिया। गीत-संगान से लेकर ओजस्वी वक्तृत्व तक, बहुश्रुत परिषद के संयोजन से लेकर घर-घर पगलिए तक, रात्रिकालीन रामायण के व्याख्यान से लेकर वर्तमान लाडनूं प्रवास में भिखू जश रसायन के वाचन तक—आपश्री की बहुमुखी प्रतिभा निरंतर सामने आती रही है।
योग्य पात्र को महनीय सौगात :
यह सब कुछ आचार्य प्रवर के दिशा-निर्देश से ही संभव था। आचार्य प्रवर ने जिस प्रकार अपने उत्तराधिकारी को क्रमशः विभिन्न दायित्व सौंपते हुए तैयार किया, वह सबके लिए अनुकरणीय है। जिस व्यक्ति की प्रतिभा को पहचानकर, उसकी क्षमताओं को परखकर और उसे निरंतर दायित्व देकर आचार्य प्रवर ने तैयार किया, उसी उपयुक्त पात्र की युवाचार्य नियुक्ति के रूप में धर्मसंघ को एक महनीय सौगात प्राप्त हुई है। इसके लिए संपूर्ण धर्मसंघ आचार्य प्रवर के प्रति कृतज्ञ है, नतमस्तक है।
खोज और पात्रता का सुंदर संगम :
अपने समर्पण, साधना, सहजता, गंभीरता आदि अनेक गुणों से युवाचार्य श्री महावीर कुमार जी ने आचार्य श्री महाश्रमण जी के अनेकों वर्षों की खोज को पूर्णता प्रदान करवाकर जो कार्य किया है, वह सबके लिए आनंददायक और प्रेरणादायक है। आचार्य प्रवर की वर्षों की खोज और युवाचार्य श्री महावीर कुमार जी की साधना, समर्पण एवं पात्रता का यह सुंदर संगम आज धर्मसंघ के लिए विशेष आनंद का विषय है।
मंगलभावना एवं वंदन :
युवाचार्य मनोनयन एवं वर्धापन के इस अवसर पर श्री जैन श्वेतांबर तेरापंथ धर्मसंघ के नवम युवाचार्य को शत-शत वंदन। आचार्य-युवाचार्य की यह वीर गोयम-सी जोड़ी युगों-युगों तक धर्मसंघ को अपने ज्ञान, साधना और नेतृत्व से आलोकित करती रहे—इसी मंगलभावना के साथ अनंत शुभकामनाएँ। वंदे आचार्यवरम्, वंदे युवाचार्यवरम्।